होली हे भई होली हे, बुरा न मानों होली हे। होली के नाम सुनते साठ मन में एक उमंग अऊ खुसी छा जाथे। काबर होली के तिहार ह घर में बइठ के मनाय के नोहे। ए तिहार ह पारा मोहल्ला अऊ गांव भरके मिलके मनाय के तिहार हरे। कब मनाथे – होली के तिहार ल फागुन महीना के पुन्नी के दिन मनाय जाथे। एकर पहिली बसंत पंचमी के दिन से होली के लकड़ी सकेले के सुरु कर देथे। लइका मन ह सुक्खा लकड़ी ल धीरे धीरे करके सकेलत रहिथे। लकड़ी…
Read MoreYear: 2018
रंग डोरी होली
रंग डोरी-डार ले गोरी, मया पिरीत के संग म, आगे हे फागुन मोर नवा-नवा रंग म। झूमे हे कान्हा-राधा के संग म, मोर संग झुम ले तै, रंग के उमंग म। रंग ले भरे गोरी, तोर लाल-लाल गाल हे, होरी म माते, तोर रंग के कमाल हे। फ़ाग गए फगुनिया, जियरा बेहाल हे, रात भर बाजे नंगाडा, सुर अउ ताल हे। रंग म तै मात ले गोरी, रंग के तिहार हे, हरियर अउ लाल, तोर म दिखथे बवाल हे। रंग के तिहार, होली रंग के तिहार हे, नवा-नवा रंग म,…
Read Moreधीर लगहा तैं चल रे जिनगी
धीर लगहा तैं चल रे जिनगी, इहाँ काँटा ले सजे बजार हवय। तन हा मोरो झँवागे करम घाम मा, देख पानी बिन नदिया कछार हवय।। मया पीरित खोजत पहाथे उमर, अऊ दुख मा जरईया संसार हवय।। कतको गिंजरत हे माला पहिर फूल के, मोर गर मा तो हँसिया के धार हवय।। सच के अब तो कोनों पुछईया नहीं, झूठ लबारी के जम्मो लगवार हवय।। पईसा मा बिकथे, मया अउ नता, सिरतोन बस दाई के दुलार हवय।। राम कुमार साहू सिल्हाटी, कबीरधाम मो नं 9340434893
Read Moreबिकास के बदचाल म होली होवथे बदहाल
ए दे, होली आ गे। फागुनी बयार ले गांव-गली, जंगल-पहाड़, सहर डहर चारों कोती मया महरथे। पऊर साल के होली म टेंगनू अउ बनऊ के अनबोलना ल तिहारू ह टोरे रीहिस। टेंगनू अउ बनऊ म सुघर मितानी हो गे। फेर ये मितानी ह काई कस जनइस ! चम्मास म टेंगनू ह अपन खेत के पानी ल रंइगइस। खाल्हे म बनऊ के खेत। बनऊ ह टेंगनू के खेत के पानी ल नइ झोंकों कहि के बिबाद सुरू कर दीस। एकर ले दूनों म तनातनी होगे। मितानी टूटगे। बईर के काई फेर…
Read Moreपइधे गाय कछारे जाय
पइधे गाय कछारे जाय भेजेन करके, गजब भरोसा। पतरी परही, तीन परोसा। खरतरिहा जब कुरसी पाइन, जनता ल ठेंगवा चंटवाइन। हाना नोहे, सिरतोन आय, पइधे गाय, कछारे जाय ॥ ऊप्पर ले, बड़ दिखथे सिधवा, अंतस ले घघोले बघवा। निचट निझमहा, बेरा पाके, मुंहूं पोंछथें, चुकता खा के। तइहा ले टकरहा आय, पइधे गाय कछारे जाय ॥ गर म टेम्पा, घंटी बांधव, चेतलग रहि के बखरी राखव। रूंधना टोरिस हरहा गरूवा, घर के घला, बना दिस हरूवा। हरही संग, कपिला बउराय। हाना नोहे, सिरतोन आय, पइधे गाय, कछारे जाय ॥ –गजानंद…
Read Moreमया के रंग : लघु कथा
सुकलू ह होली तिहार के दिन परछी मं बइठे रहिस। ओकर टुरा किशन ह अपन दाई ल बतावत रहिस, काकी ह अड़बड़ अकन रोटी बनावत हे, जतका झन काकी घर आवत हे, ओतका झन ल रोटी बांटत हे, फेर मोला नइ दिस हे। अपन लइका किशन के गोठ ल सुनके सुकलू ह अपन लइकापन ल सुरता करे बर धर लिस। सुकलू ह आठ बछर के रहिस त होली तिहार के दिन ओकर दाई सुखिया ह गउटनीन घर बुता करे बर गिस हे त ओकर पाछू-पाछू सुकलू ह तको गिस।गउटनीन ह…
Read Moreकका के बिहाव : सार-छंद
कका बता कब करबे शादी, देख जवानी जाथे ! बइठे रोथे दादी दादा, संसो घानी खाथे !!1!! ढ़ींचिक-ढ़ींचिक नाचत जाबो, बनके तोर बराती ! पागा-पगड़ी माथ बँधाये, देखे राह घराती !!2!! गँड़वा-डीजे जेन लगाले, नागिन पार बजाबो ! बुड़हा-बुड़ही रंग जमाही, सबला खींच नचाबो !!3!! दाई कइही जी देरानी, घर अँगना के रानी! आव-भाव मा देवी रइही, देही सबला पानी !!4!! रोजगार के करले जोखा, करथच रोज बहाना ! गाँव गली मा सुनथे बाबू, देथैं कतको ताना !!5!! नवा-नवा तो कपड़ा लाबे, बनबे बढ़िया राजा ! इसनो अबरख साज लगाबे,…
Read Moreमहतारी भासा
मातृभासा म बेवहार ह बसथे, इही तो हमर संसकार ल गढथे। मइनखे के बानी के संगेसंग, सिक्छा म वोकर अलख ह जगथे। लईकोरी के जब लईका रोथे, इही भाखा के बोल ह फबथे। आगू आगू ले सरकथे काम, महतारी के घलो मान ह बड़थे। समाज के होथे असल चिन्हारी, भासा म जब हमर संसकिरती ह रचथे। सकलाइन एके ठऊर म त, एकजुटता के भावों ह पनप थे। नवा पीढ़ी के मइनखे मन, घरघुन्दिया असन मिन्झारत हे। अंतस म बसे भाखा के मया ल, हंसी ठिठोरी करत बेंझावत हे। महतारी भासा…
Read Moreनारी के महिमा भारी हे
हमर हिन्दू धरम मा नारी के दरजा ला नर ले ऊँच माने गे हावय। सबले सुग्घर बात हमर पुरखा के परमपरा मा हे के नारी ला देवी के रुप मा पूजे जाथे। हमर वेद पुरान अउ ग्रंथ मन मा घलाव नारी हा बिसेस इस्थान मा इस्थापित हावय। ए बात के प्रमान मनु स्मृति मा अइसन प्रकार ले हावय। यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। यत्रे तास्तु न पूजयन्ते सर्वास्तफला: क्रिया।। मनु समृति अनुसार- जिहाँ नारी के मान, गउन अउ आदर-सत्कार होथे उहाँ देवता मन हा प्रसन्न रहीथें अउ जिहाँ अइसन…
Read Moreराज काज म लाबोन
चलव धधकाबो भाखा के आगी ल, दउड़ समर म कूद जाबों रे गुरतुर मीठ छतीसगढ़ी भाखा ल्, हमर राजकाज म लाबोंन रे हमर राज म दूसर के भाखा, होवत हे छतीसगढ़ी के अपमान दूसर के भाखा जबर मोटहा, दूबर पातर छतीसगढ़ी काडी समान अपन भाखा के बढाबोन मान, चलव जुरमिल सुनता बधाबोन रे गुरतुर मीठ छतीसगढ़ी भाखा ल, हमर राजकाज म लाबोंन रे देवनागरी ले उपजे बाढ़हे, अब छाती ताने राजा ठाड़हे हे दूसर ल मया देवईया हमर भाखा, आज अपने विपत म माड़हे हे अपन भाखा ल देवाबोन पहिचान,…
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