कइसे उदुप ले डोकरा होगे जंगल के बघवा तेंहा, कइसे चऊंर–चाबे बोकरा होगे। एक कोरी म छै बछर कम, कइसे उदुप ले, डोकरा होगे।। जौन आथे तौन, बखरी ला उजारथे। पेट ला हमर काट के, देखावटी सुलारथे। छत्तीसगढ़ ल चरागन भुंइया बना लीन, चोरहा मन चौरस्ता म कोतवाल ल ललकारथे। मिठलबरा मन के डिपरा पेट, हमर बीता भर खोदरा होगे। तोर रग रग म, पैरी महानदी उछलथे, तोर बहां म सिहावा कांदा डोंगर उचकथे। सुरूज कस जोत तोर आंखी बरथे। तोर भाखा गरू, बादर असन गरजथे ॥ अपन आप ल…
Read MoreYear: 2018
मोर भारत देश के माटी
चंदन के समान हे, जेकर पावन कोरा मे जनमे देवता कस बेटा किसान हे, इही माटी मे जनम धरेंव ये बात के मोला अभीमान हे। कोनो हिन्दु हे कोनो मुस्लिम, कोनो सिख ईसाई हे, मया पिरीत के डोरी बंधाहे, जम्मो झन ह भाई ये, रमायन, गीता, बाईबल कोनो मेर, कहुँ गुरू ग्रंथ अऊ कुरान हे, इही माटी मे जनम धरेंव ये बात के मोला अभीमान हे। हर मनखे के नस नस मे, जिहा दया मया ह बोहाथे, जिंहा कोयली बरोबर किसम किसम के, बोली भाखा सुहाथे, जिहा बखत परे मे…
Read Moreगरीब बनो अउ बनाओ
नवा बछर के बधाई म मोर एकलौता संगवारी जब ले केहे हे – ‘मंगलमय’। मंगलवार घलो इतवारमय लागत हे। इतवार माने सब छोड़छाड़ के, हाथ गोड़ लमाके अटियाय के दिन। फुरसत के छिन। अच्छा दिन।जब ले सुने हंव गरीब नामक जीव के उद्धार बिल्कुल होवईयाच हे, संडेवा काड़ी सहिन शरीर के छाती मुस्कुल म बीस पचीस इंच होही, फूलके छप्पन इंच होगे हवय। अब देखव न हर कोई गरीबेच के सेवा ल अपन धरम मान के तन मन लगाके धन बनात हें। जब ले ए दुनिया के सिरजन होय हे…
Read Moreबसंती हवा
लाल लाल फूले हे, परसा के फूल। बांधे हे पेड़ मा, झूलना ला झूल। पिंयर पिंयर दिखत हे, सरसों के खेत। गाय गरु चरत हे, करले थोकिन चेत। टप टप टपकत हावय, मऊहा के फर। बीन बीन के टूरी तैं, झंऊहा मा धर। आये हे बसंत रितु, चलत हे बयार। मेला घूमे ला जाबोन, रहिबे तइयार। आवत हे होली अऊ, गाबोन जी फाग। मय गाहूं गाना अऊ, तैं झोंकबे राग। मटक मटक रेंगत हे, मोटियारी टूरी। खन खन बजावत हे, हाथ के चूरी। फुरुर फुरुर चलत हे, बसंती हवा। मटकावत…
Read Moreहमर खान-पान मा नून-मिरचा
मिरचा कहिबे ताहन सुनईया अउ कहईया दूनो के मुहु चुरपुराय अउ आँखी झरझराय सरीख लागथे, फेर उही मिरचा ला हमर खान-पान ले अलगाय के सोचेच भर ले हमर मुहु के सुवाद सबर दिन बर सिराये सरीख घलो लागथे। नून अउ मिरचा बिन काहिंच नइ सुहावय। ये दूनो ला हमन कब ले बउरत हन तेखर परमान घलो जल्दी नइ मिल सकय। फेर बेरा बदले के संग जम्मों जिनिस असन यहू मन ला बउरे के तरीका मा फरक आय हे। अइसे तो पहिलीच ले मिरचा कई किसम के रीहिस। फेर अब शंकरण…
Read Moreकहानी : डाक्टर बिलवा महराज के बेटा पीच दारू
आज गाँव म स्वक्षता अभियान बर रैली निकले हे,मेडम-गुरु जी मन आगू-पाछु रेंगत हे ! स्कूल के जतका लइका हें सब लाईन लगाय ओरी-ओर रेंगत हवैं अउ नारा लगात हें ! स्वक्षता लाना हे.. गाँव बचाना हे, बोलव दीदी बोलव भईया हर-हर…शौंचालय बनवाबो घर-घर नारा ल चिल्लावत रैली ह जावत हे ! भक्कल अपन दुकान म बइठे-बइठे देखत हे संग म ओकर गोसइन चुनिया घलो हे भक्कल चुनिया ल कइथे ए गाँव के कुछ नइ हो सकै, चुनिया कइथे सहीं काहत हवच ! भक्कल खुर्सी ले उठथे दुकान के कोंट्टा…
Read Moreआल्हा छंद : वीर शिवाजी के शान
वीर शिवाजी जयंती 19 फरवरी वीर शिवाजी जनमे जग मा, शेर सँही ए राखिन शान। धन्य-धन्य महतारी ऊँखर, जनमीं जेमन पूत महान।।1 ददा शाहजी जीजा दाई, जनम धरे शिवनेरी धाम। नाँव छत्रपति जेखर अम्मर, कोटि-कोटि करँव प्रनाम।।2 नान्हें पन ले आज्ञाकारी, गुरू ददा दाई ला मान। देश भक्ति नस-नस मा दँउड़े, हाजिर राहँय धरके जान।।3 धरम-करम मा अघुवा आगर, सिक्छा-दिक्छा पुन्य प्रताप। सिक्छक माता सकल भवानी, सबले जादा छपगे छाप।।4 छदर-बदर सब हिन्दू परजा, करके सुन्ता सकला साथ। भारत भुँइयाँ भूसन राजा, तोर अमित हा लागय माथ।।5 कन्हैया साहू “अमित”…
Read Moreसेल्फी ह घर परवार समाज ल बिलहोरत हाबय
समे बदल गेहे जमाना कती ले कती भागत हे तेकर ठिकाना नईये, जमाना सन पल्ला भगैईया हमर मन के मगज ह कोन चिखला दांदर म बोजा गेहे, सबो के मति अऊ सोचों ह सेल्फी सन रहीके सेल्फीस होगे हे। सुघ्घर दिखे के चक्कर में हमन भुला जथन कोन करा गढ्ढा हे, कतीहा पखरा हे, कती के रद्दा म काँटा बगरे हे सेल्फीस बनके एक धर्रा म रेंगत हन। थोरको झमेला ल ककरो नई सेहे सकन, अकेल्ला के खुशी बर घर परवार ल मजधार में छोड़ के सेल्फी सन रेंग देथन।…
Read Moreव्यंग्य : जनता गाय
सरग म, पिरथी के गाय मन ला, दोरदिर ले निंगत देखिस त, बरम्हाजी नराज होगे। चित्रगुप्त ला, कारन पूछिस। चित्रगुप्त किथे – मरे के पाछू, गाय कस परानी मन अऊ कतिहां जाही भगवान, तिहीं बता भलुक ? बरम्हाजी पूछिस – अतेक अकन, एके संघरा मरिस तेमा ? चित्रगुप्त किथे – भाग म, जतका दिन जिये के हे, तेकर ले जादा, कन्हो ला जियन देहस का तेमा …..? रिहिस बात कारन के ….., कन्हो किथे, भूख ले मरे हे, कन्हो किथे, जाड़ म मरे हे …काकर ला पतियांवव। गाय ला भेजत…
Read Moreलघुकथा : कन्या भोज
आज रमेश घर बरा, सोंहारी, खीर, पुरी आनी बानी के जिनीस बनत राहय। ओकर सुगंध ह महर महर घर भर अऊ बाहिर तक ममहावत राहय। रमेश के नान – नान लइका मन घूम घूम के खावत रिहिसे। कुरिया में बइठे रमेश के दाई ह देखत राहय, के बहू ह मोरो बर कब रोटी पीठा लाही। भूख के मारे ओकर जी ह कलबलात राहय। फेर बहू के आदत ल देखके बोल नइ सकत राहय। बिचारी ह कलेचुप खटिया में बइठ के टुकुर – टुकुर देखत राहय। थोकिन बाद में पारा परोस…
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