बसंत रितु ल सब रितु के राजा कहे जाथे। काबर के बसंत रितु के मौसम बहुत सुहाना होथे। ए समय न जादा जाड़ राहे न जादा गरमी। ए रितु में बाग बगीचा सब डाहर आनी बानी के फूल फूले रहिथे अउ महर महर ममहावत रहिथे। खेत में सरसों के फूल ह सोना कस चमकत रहिथे। गेहूं के बाली ह लहरावत रहिथे। आमा के पेड़ में मउर ह निकल जथे। चारों डाहर तितली मन उड़ावत रहिथे। कोयल ह कुहू कुहू बोलत रहिथे। नर नारी के मन ह डोलत रहिथे। ए सब…
Read MoreYear: 2019
कविता- बसंत बहार
बसंत बहार छागे सुग्घर, कोइली गीत गावत हे। अमरइया के डारा सुग्घर, लहर-लहर लहरावत हे।। चिरइ चिरगुन चींव-चींव करके, सुग्घर चहकी लगावत हे। कउँवा करत हे काँव-काँव, तितुर राग बगरावत हे।। सरसों के सोनहा फुल फुलगे, अरसी हा लहलहावत हे। सुरूज मुखी हा चारो कोती, सुग्घर अँजोर बगरावत हे।। फुल बगियाँ मा फुल फुलगे, सतरंगी रंग बगरावत हे, मलनियाँ रानी मगन होके, मने मन मुसकावत हे।। आमा अमरइया मउँरगे सुग्घर, डारा पाना हरियावत हे। रूख राइ हा नाचत सुग्घर, पुरवइया अँचरा डोलावत हे।। वीना धरे हे सारदा माई, सातो सुर…
Read Moreकविता – महतारी भाखा
छत्तीसगढ़िया अब सब्बो झन आघु अवव, महतारी भाखा ल जगाये बर जाबो। गांव-गांव म किंजर के छत्तीसगढ़ के गोठ-गोठियाबो, सब्बो के करेजा म छत्तीसगढ़ी भाखा ल जगाबो। छत्तीसगढ़ महतारी के मया ल सब्बो कोती बगराबो, संगी -संगवारी संग छत्तीसगढ़ी म गोठियाबो। महतारी के अब करजा ल चुकाबो, छत्तीसगढ़ म छत्तीसगढ़ी भाखा म गोठियाबो। छत्तीसगढ़ी भाखा-बोली के मीठ मया, सब्बो छत्तीसगढ़िया अउ परदेसिया मनखे ल बताबो। महतारी भाखा ल जगाबो संगी, अवव हमर महतारी भाखा ल जगाबो। अनिल कुमार पाली तारबाहर बिलासपुर छत्तीसगढ़ मो.न:- 7722906664
Read Moreछत्तीसगढ़ी ग़ज़ल
1 कर दे घोषना एक राम जी। पाँचों साल आराम राम जी। दावत खा ले का के हे चिंता। हमरे तोला सलाम राम जी। हावै बड़का जी तोर भाग ह, पढ़ ले तैं हर, कलाम राम जी। आने के काम म टाँग अड़ाना, हावै बस तोर काम राम जी। चारी – चुगली ह महामंत्र हे, सुबह हो या हो शाम राम जी। 2 नँगरा मन हर पुचपुचाही , तब का होही? अगुवा मन जब मुँहलुकाही, तब का होही? पनियर-पातर खा के हम हर जिनगी जिथन, धरती हर बंजर हो जाही,…
Read Moreसंसो
आज संझौती बेरा म बुता ले लहुट के आयेंव त हमर सिरीमति ह अनमनहा बैठे राहय।ओला अइसन दसा म देखके मे डर्रागेंव।सोचेंव आज फेर का होगे?काकरो संग बातिक बाता होगे धुन एकर मइके के कोनो बिपतवाला गोठ सुन परिस का। में ह पूछेंव-कस ओ!आज अतेक चुप काबर बैठे हस? ओहा किहिस -कुछु नीहे गा!अउ अपन बुता काम म बिलमगे।जें खायके बाद ओहा बुता काम ले रीता होइस त फेर पूछेंव-कुछु तो बात हे खिल्लू के दाई!बता न मोला! मोर गोठ ल सुनके ओकर आंखी ले आंसू निथरगे।ओहा बताइस-तें ह हमर…
Read Moreबसंत पंचमी अउ ओखर महिमा
बसंत पंचमी हमर हिंदूमन के तिहार म ले एक बिसेस तिहार हे। ये दिन गियान के देबी दाई माता सरस्वती के आराधाना करे जाथे। भारत अउ नेपाल जेहा पहिली हिंदू देस रहसि, म बछर भर ल छै भाग म बांटे गे हे। येमा बसंत रितु सबसे सुखद रितु हे। जब परकिरिती म सबो कती नवसिरिजन अउ उल्लास के वातावरण होथे। खेत म सोना के रूप म सरसों के फूल चमके लगते। गेंहूॅं अउ जौ म बाली आ जाथे। आमा के रूख म बउर लग जाथे अउ उपर ले कोेयली के…
Read Moreरीतु बसंत के अवई ह अंतस में मदरस घोरथे
हमर भुईयां के मौसम के बखान मैंहा काय करव येकर बखान तो धरती, अगास, आगी, पानी, हवा सबो गोठियात हे। छै भाग में बाटे हाबय जेमे एक मोसम के नाव हे बसंत, जेकर आय ले मनखे, पशु पक्षी, पेड़ पऊधा अऊ परकिरती सबो परानी म अतेक उछाह भर जथे जेकर कोनों सीमा नईये। माघ के महीना चारों कोती जेती आँख गड़ाबे हरियरे हरियर, जाड़ के भागे के दिन अऊ घाम में थोरको नरमी त कहू जादा समे घाम ल तापे त घाम के चमचमई। पलाश के पेड़ ल देखबे त…
Read Moreनान्हे कहिनी : नोनी
आज राधा अउ जानकी नल म पानी भरत खानी एक दूसर संग गोठियावत राहय। राधा ह जानकी ल पूछथे-‘हव बहिनी! सुने हंव तोर बर नवा सगा आय रिहिस किके।’ जानकी ह बताथे-“हव रे! आय तो रिहिन हे!” ‘त तोर का बिचार हे?’ “मोर का बिचार रही बहिनी! दाई-ददा जेकर अंगरी धरा दिही ओकर संग चल देहूं। आखिर उंकर मुड के बोझा तो बनगे हंव” ‘पाछू घनी धोखा खाय हस रे! सोच समझ के निरनय लेबे।’-राधा किथे। “मोर निरनय ल कब कोन सुने हे रे! पाछू समे में ह अउ पढहूं…
Read Moreबसंत आगे रे संगवारी
घाम म ह जनावत हे पुरवाही पवन सुरूर-सुरूर बहत हे अमराई ह सुघ्घर मह महावत हे बिहिनिहा के बेरा म चिराई-चुरगुन मन मुचमुचावत हे बर-पीपर घलो खिलखिलावत हे महुआ, अउ टेसू म गुमान आगे बसंत आगे रे संगवारी कोयली ह कुहकत हे संरसों ह घलो महकत हे सुरूर-सुरूर पवन पुरवाही भरत हे मोर अंगना म संगवारी बसंत आगे जेती देखव तेति हरिहर लागे खेत-खार के रुख-राई मन भरमाथे फागुन बन के आगे पहुना अंगना म हे उछल मंगल मड़वा सज के संगवारी के बसंत आगे अंगना म रंग-गुलाल खेबोन बसंत…
Read Moreमोर ददा ला तनखा कब मिलही
दस बच्छर के नीतिन अउ एक महिना बड़े ओकर कका के बेटी टिया अँगना मा खेलत रहिस। दूनो मा कोन जनी काय सरत लगिस तब टिया हा कहे लगिस मेहा हार जहूँ ता मोर पइसा ला मोर पापा ला तनखा मिलही तब देहँव। नीतिन समझ नइ सकिस कि ओकर कका हा कहाँ ले तनखा पाथय,कोन ओला तनखा देथय। ओहा ओतका बेरा तो खेल लिहिस फेर ओखर मन मा बइठ गे कि हमर ददा ला तनखा कब मिलथे। संझा नीतिन अपन ददा मोहन के रद्दा देखत रहय।खेत ले रापा ला खाँद…
Read More