विष्णुपद छंद : हे जग के जननी

जुग जुग ले कवि गावत हावँय,नारी के महिमा।
रूप अनूप निहारत दुनिया, नारी के छवि मा।

प्यार दुलार दया के नारी,अनुपम रूप धरे।
भुँइया मा ममता उपजाये,जम के त्रास हरे।

जग के खींचे मर्यादा मा, बन जल धार बहे।
मातु-बहिन बेटी पत्नी बन,सुख दुख संग सहे।

मीथक ला लोहा मनवाये,नव प्रतिमान गढ़े।
पुन्न प्रताप कृपा ला पाके,जीवन मूल्य बढ़े।

धरती से आगास तलक ले, गूँजत हे बल हा।
तोर धमक ला देख दुबक गे,धन बल अउ कल हा।

नारी क्षमता देख धरागे, अँगरी दाँत तरी।
जनम जनम के मतलाये मन,होगे आज फरी।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर “अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा
मोबा-9685216602
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