सुन्दरपुर म एक झन बहुत बढ़िया साधु रहय। जेन हर रोज भगवान भक्ति म लीन रहय। येकर कुटिया म बहुत झन चेला रहय जेन मन अपन गुरुजी के बताय मार्ग, रस्ता म रेंगय। इही म एक झन किरपाल नाम के चेला रहीस। तेन हर अपन गुरुजी के संझा बिहनिया पांव परय अउ हर कहना ल मानय। एक दिन गुरुजी हर अपन सब चेला ल उंकर-उंकर लईक काम बताईस। सब चेला अपन-अपन काम म चल दीन। बाच गीस किरपाल हर तेन ल गुरुजी हर कइथे- बेटा किरपाल तैं आज सुख्खा-सुख्खा लकड़ी…
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बांझ के पीरा-बांझ के सुख
लघुकथा‘तें मोला टूरा-टूरी नइ देस ना सुन्दरी, मे दूसर बिहाव करहूं तें मोला दोसदार मत कबे, काबर नी देत हस मोला तेंहा टूरा-टूरी। दू बच्छर ले जादा होगे फेर तोर पांव भारी नी होवत हे।’ भुलऊ ह अपन सुन्दरी नाम के गोसइन ल धमका के काहत राहय।‘मोर किस्मते मा नइ हे तेला का करहूं, तोला भारी पांव वाली गोसइन लाना हे ते ले आ, मोला कुछु नी कहना हे।’ सुन्दरी ताना ल सुन के फैसला सुना दीस।‘भुलऊ ल मौउका मिलिस। तहां ले राम्हीन ला बना के ले अइस जेन साल…
Read Moreसोनचिरई
इंकर रोवई-धोवई ल देखके कथे- अब रोय ले कोई फायदा नइहे। नबालिग उमर म बिहाव करे ले अइसने होथे- जच्चा अउ बच्चा के मउत। ओ न्हारी सियारी सेकलाथे ताहन किसान मन के चोला ह हरियाथे। हरियाही काबर नहीं, काबर कि इही ओन्हारी-सियारी के बदौलत तो जिनगी ल संवारना रहिथे। बने सुकाल होगे त सोचे बिचारे काम बूता ल निपटाथें। कहुं दुकाल परगे त दुब्बर बर दु असाढ़ हो जथे। दुरदेसी कका ह बेलौदी गांव के उन्नत किसान आय। छपराही के ऊपर म ओकर पांच एकड़ जमीन हे। भगवान के दे…
Read Moreखने ला न कोड़े ला, धरे ल खबोसा
हाना म कहिनी एक साहार म एक झन आदमी राहाय। ओ कहिथे- भगवान हा सब झन ल अमीर बनाए हे, भला मुहीच ल काबर गरीब बनईस होही? मैं ये बात के निरने कराहूं तभे बनहीं। अइसे कहिके ओ हा भगवान ला खोजत-खोजत ऐती-ओती, जंगल-झाड़ी डाहार ले जावत रहिथे। रसता म ओला एक ठक गाहबर (हुंडरा) भेंटथे। हुड़रा ह पुछथे- तैं लकर-लकर काहां जात हस जी कहिके। त ओ हा अपन सबो हाल ल बताथे। त हुंड़रा कहिथे- अरे, अइसने मोरो एक ठन बात हे गा, तैं जावत हस त मोरो…
Read Moreकहिनी : फंदी बेंदरा
सतजुगहा किस्सा ये, ओ पइत मनखे जनावर अउ चिरई-चिरगुन, सांप डेंड़ू, सबे मन एक दूसर के भाखा ओखरे बर जानंय। अपन अपन रीत रद्दा म चलयं। एक दूसर के सुख-दुख म ठाड़ होवय। सबे बर अपन भाखा हर सबले आगर अउ ओग्गर माने जावय। भाखा अउ किरिया तो जियई-मरई के ताग माने जावय। तभो ले कतकोन नवटिप्पा लंदी-फंदी घला राहंय। उही जुग म एक ठन जंगल मं लंदी-फंदी बेंदरा राहय। नांव कबे ते भुस्क वोहर आनी-बानी के हाना, ठिठोली, जनउला, चाखना अऊ ठोली-बोली ल अकताहा राहय। जौन एक बेर ओकर…
Read Moreकहिनी : दोखही
हिम्मत करत रमेसर कहिस, आप मन के मन आतीस तब चंदा के एक पइत अऊ घर बसा देतेन। वाह बेटा वाह तयं मोर अंतस के बात ल कहि डारे। जेला मय संकोचवस कहूं ला नई कहे सकत रहेंव तयं कहि डारे बेटा बुधराम गुरूजी कहिस। मयं तोर बात विचार ले सहमत हंव फेर मोर एकठन शर्त हे। बर- बिहाव म जतका खरचा होही तेला मंय खुद करिहंव। चंदा ल बहुरिया बना के लाय रहेंव बेटी बना के कनियादान मंय खुद करिहंव।’ रमेसर के दाई बिराजो ला, बेटी अवतारे के बड़…
Read Moreबहुरिया – कहिनी
बहु ह ससुरार म घलो मइके कस मया अउ दुलार म राहय। ससुर काहय बेटी हमरो बेटी ह घलो ककरो बेटी बनही, हमू मन सोचबो न बेटी ल ससुरार म घलो बेटी कस दुलार मिलय। हमन जइसन करबो तइसन तो हमरो बेटी मन ल मिलही मान सम्मान पाना कुछु अपनो हाथ का रइथे बेटी। देखत हावच बेटी मनोज ह अपन माइलोग के बात ल मान के अलग घर म चलदीच, बिचारी कौशिला ह नानपन ले अपन लइका अस सब ल पालिस पोसिस, पढ़इस-लिखइस अउ देख ले दुए महीना म ओकर…
Read Moreमोला कभू पति झन मिलय – कहिनी
धान कोचिया राधे हर हुत करात अइस- सदानंद ठेलहा हस का रे? चल खातुगोदाम मेर मेटाडोर खड़े हे। विसउहा तेली के धान ल भरना हे। कइसे सुस्त दिखत हस रे। अल्लर- अल्लर। चल जल्दी। सुरगी म मार लेबे एकाध पउवा। पउवा के गोठ सुन के सदानंद के मुंहुं पंछागे। एक्के भाखा म टुंग ले उठगे।’ एसो के बइसाख म मंगली ह अठरा बछर के होगे। बिसराम अउ सोनारिन ल मंगली कस सुघ्घर बेटी पाए ले आन असन जादा सगा-सोदर देखे बर नइ लागिस। बड़ सुंदर रूपस राहै मंगली हर। मंगली…
Read Moreराजा – नान्हे कहिनी
देवकी अपन बैसाखी ल देख के सोचे का होगे ए टूरा मन ल घेरी-बेरी आ-आ के बिहाव के विचार रखंय। आज सब्बो झन मन मुंहु फेर के भागत हाबे। ओतकी बेर अरविंद अइस, जेन ल देख के देवकी ह थर्रागे, काबर कि करिया कुकुर संग कोन बिहाव करही कहिके वोखर खूब हंसी उड़ाय रीहिस। अरविंद कीहिस- मेहा बैसाखी के सहारा ले चलत देखे बर आय हंव। अऊ चलत देख के बड़ खुस हांवव, अब कोनों फिकर नई हे। आराम से चलत फिरत अपन नौकरी कर सकत हव, कोनों सहारा के…
Read Moreढेला अऊ पत्ता
छोटकू म पहिली कक्षा म भरती होयेन त छोटे गुरूजी बिजलाल वरमा हर ढेला अऊ पत्ता के कहिनी सुनाये रिहिस से तेकर सुरता आज ले हावे। ठेला अऊ पत्ता दू परोसी दूनों म अड़बड़ मया राहय बिपत के बेटा म तको एक दूसर के संग देवे म गूलाझांझटी नई करेय। एक दिन ढेला हर पत्ता ल कहिथे संगवारी असाढ क़े दिन बादर आगे पानी गिरे ल धरही तइसे तैंहा मोर ऊपर तोपा जाबे एकर से मय घुरे ले बांच जाहूं। पत्ता हर ठेला के बात ल मान के हुंकारू भरथे।…
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