चिल्हर के रोना

आज के समे अइसन उपाय तो चिल्हर के रोना बर करे नी जा सकय। काबर के चिल्हर के रोना एक, दू अउ पांच रुपिया के जादा रथे अउ एकर नोट छपना बंद हो गे हे। अरे बंद नी होय होही ते कमती जरूर हो गेहे। तेखरे सेती अब चिल्हर के रोना ल खतम नी करे जा सके। ये सबर दिन के रोना बन गे हे, अम्मर हो गे हे। सरकार चुमड़ी-चुमड़ी सिक्का बांटथे फेर कोजनी चारेच दिन म कहां उछिन हो जथे। चिल्हर के रोना फेर जस के तस। कतको…

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नान्हे कहिनी : झन फूंटय घर

खाये पीये के मामला म, माई लोगिन मन म मनमुटाव होय के संभावना रहिथे। तेखरे सेति, ददा ह घर के जम्मो कामकाज ल हम दूनो भाई म बांट देये हे, अउ तीज तिहार म, परब म, रोटी, पीठा, खई खजेनी ल अपन हाथ म राखे हे। सब ला बरोबर बांटय ताकी झन फूटय घर, झन होवय मनमुटाव, दरार। तिलक आत-जात राहय संतू के घर। अइसे तो संतू के कुछ रिस्तेदार नई लगे तिलक, फेर जिहां परेम, तिहां का नेम, का जरूरत कोनो रिस्ता के। परेम तो खुद सबले बड़े अउ…

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कबिता : कइसे रोकंव बैरी मन ल

पांखी लगाके उड़ा जाथे जी, कइसे रोकंव बैरी मन ला।छरिया जाथे मोर मति जी, घुनहा कर दीस ये तन ला।उत्ती-बूड़ती, रक्सहूं-भंडार, चारो मुड़ा घूम आथे।जब भी जेती मन लागथे, ये हा उड़ा जाथे॥मन ह मन नई रहिगे, हो गे हे पखेरू।डरत रहिथौं मैं एखर से, जइसे सांप डेरू॥इरखा के जहरीला नख हे, छलकपट के दांत हे।लोभ-मोह के संगी बने हे, खून से सने हाथ हे॥हो गे हे अड़बड़ ये हा ढीठहा, रख लेथे अपन परन ला… पांखी लगा के….साधु संत के संग धरेंव, ये तन ला सुधारे बर।भजन कीतरन रोज…

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कबिता : चोरी ऊपर ले सीना जोरी

मध्यान्ह भोजन के टेम रीहिसखाना पकईया ह मोलासरकारी परसाद ल दे के कहिसथोर कीन चीख तो गुरूजीचीखत-चीखत मे हअतका खा गेंवकि ऊही करा कुरसी मासुत गेंव।अचानक बीईओ साहब हस्कूल आईसमोला पढाये के बदला मा सूते पाईसओकर गुस्सा ह पांवतरी ल छोड़ माथा मा चढ़गीसमोला झंझकोर के जगाईस अऊ कहीसकक्छा मा तोलाथोरको सरम नई आईसमें ह थोरकिन उसनींदा रहेंवतभो ले साहब ल कहेंवसाहब तें ह मोला गलत झन समझमें ह लइका मन लासमझावत रेहें हवकुंभकरणी नींद कईसे होथेकुंभकरणी नींद मा आदमीमोरे कस सोथे! हरखराम पेंदरिया ‘देहाती’ श्रीराम मंदिर रोड, महासमुन्द

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पेड़ लगावा जिनगी बचावा

‘पेड़ लगाए के महत्त बहुत हावय। जेन पेड़ ल लगाये जाथे ओखर उपयोग मनखे ह कोनो न कोनो रूप म करथे। पीपर लगइस त सरीर ल दिन रात जीवनदायनी आक्सीजन मिलत रहिथे त वोकर उमर ह बाढ़ जथे वो ह सुवस्थ रहिथे। ऐखरे बर कहे गे हावय के पीपर पेड़ लगइया हजारों बछर ले पताल लोक म निवास करथे। ये बात ब्रह्मव्रर्त पुरान म लिखाय हावय’ पेड़ परानी मन बर बहुत उपयोगी हे। तेखरे सेती हमर रिसी मुनि मन पेड़-पौधा के पूजा करे के विधान बना दे हांवय। मनखे के…

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कहिनी : उपास

गांव म एक झन बिमरहा मनखे रहय। रोज के पेट पीरा म बिचारा कुछ काम-बुता करे नई सकय। भात खावय तहां ले बाहिर कोती जावय। थोरकिन हफरहा बानी तको रहीस। एक दीन के बात आय। परस हर भात खाके लोटा म पानी धरके चुपे-चाप बाहिर जाय बर निकलत रहीस ततके बेरा कईलान महराज घूमत-घामत आत रहिस। परस ल देख डारिस अउ कहे लागिस… कस जी परस, तैं चुपेचाप अभी कइसे निकलत हावस। तोला खेत खार के संसो नइए का? परस हर कईलान महराज के गोठ ल सुनके कइथे, मोर दु:ख…

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लोक कला के दीवाना रामकुमार साहू

ओ हर निचट गरीब परवार के रहीस। मोर इसकूल मा पढ़य। आज लइका मन ले ओ हर अलगेच रहीस हे। नानपन ले ओहर ‘लोककला’ के दीवान रहीस हे। ओ बखत मैं हर स्व. दाऊ रामचन्द्र देशमुख के जबड़ लोकनाटक ‘कारी’ मा बिसेसर नायक के पाठ करत रहेंव तब ‘कारी’ खातिर रामकुमार साहू के दीवानगी हर मोला चकित कर देवय। ओला ये खभर मिलतीस के फलाना जघा कारी होवत हे। तब ओहर कइसनो करके ऊंहा हबरी जातीस। पोझिटया कला, दुर्ग निवासी रामकुमार ला एक घंव पता चलीस के ग्राम पैरी मा…

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कबिता : ये देस कइसे-कइसे होवत हे

ये देस म कइसे-कइसे होवत हे।जिहां बोहावय मया-पिरीत के गंगा, लहरावय जिहां लहर-लहर तिरंगातिहां मनखे-मनखे मन के हिरदे रोवत हे॥अती होगे गोला बारूद केरोज होवत हे गोली बारी।अतलंगहा मन अलगाव वाद के बोवत हे बम के बखरी बारी।मोर हरियर बाग बगिच्चा उजरत हे, नफरत घृणा के बिजहा बोंवत हे।छत्तीसगढ़ म नक्सली मनबोकरा, भेंड़ा कस पूजत हे।बारूद लगा के, सुरंग कोड़ के मनखे-मनखे ल धूंकत हेमोर सरग सरीख भुइंया म कइसे, खूने-खून के होली होवत हे।कैंकर बस्तर रोवय बोमफार के,बिहार झारखण्ड थर्रावय।ये बइरी मन बर धुंकी नइ आवय,न मउत के थोरको…

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छत्तीसगढ़ के कर्जादार

आज छत्तीसगढ़ी ह राजभाषा बनगे हावय। राजधानी ले अतेक अकन अखबार निकलथे के अंगरी म गिनना मुसकिल हे। फेर एक ठन छत्तीसगढ़ी अखबार आज ले नई निकल पाइस। ये निमगा छत्तीसगढ़ अखबार निकाले म घाटा दिखथे। एक कालम तो होना चाही। दूसर राज्य म ऊंखर राजभासा के अखबार अउ पत्रिका दिखथे। छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाय के घोसना होय दू बछर बीत गे। फेर कोनो डाहर ले नी जनाय के छत्तीसगढ़ी ह राजभासा बन गे हे। राजधानी ले अतेक अकन अखबार निकलथे के अंगरी म गिनना मुसकिल हे। फेर एक ठन…

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फिल्मी गोठ : झन मारव गुलेल

ये बछर ह छत्तीसगढ़ राज बने के दसवां बछर आय। फेर ये दस बछर ह छत्तीसगढ़ी फिलिम के माध्यम ले छत्तीसगढ़िया मन के दस किसम के गति कर डारे हे। निश्चित रूप ले अइसन दृश्य ले बाहिर निकले के जरूरत हे। हम ये बात ल ठउका जानथन के बरसा के पानी ह तुरते उपयोग के लायक कभू नई राहय। छत्तीसगढ़ी भाखा के पहिली फिलिम ‘कहि देबे संदेश’ ले चले फिलिम यात्रा ह आज कई कोस के सफर तय कर डारे हे, फेर जस-जस वोकर यात्रा के सफर बाढ़त हे, तस-तस…

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