नमस्कार के चमत्कार

हमर पुरखा-पुरखा के चलाय मान-सम्मान परमपरा मा सबले जादा एक दुसर के अभिवादन ला महत्तम दे गे हावय। ए परपपरा हा आज घलाव सुग्घर चले आवत हे फेर चाहे एखर रकम-ढकम हा बदलत जावत हावय। हमन ए अभिवादन परमपरा मा देखथन के एक दुसर ला नमस्ते या नमस्कार करथन फेर एखर का अरथ हे सायदे जादा झन मन जानथन। आवव आज ए लेख के माधियम ले जाने के परयास करबो के अभिवादन मा नमस्ते कहे के का मतलब हावय। हिन्दू धरम सास्त्र मन के हिसाब ले ले अभिवादन के कुल…

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मजबूर मैं मजदूर

करहूँ का धन जोड़,मोर तो धन जाँगर ए। गैंती रापा संग , मोर साथी नाँगर ए। मोर गढ़े मीनार,देख लमरे बादर ला। मिहीं धरे हौं नेंव,पूछ लेना हर घर ला। भुँइयाँ ला मैं कोड़, ओगथँव पानी जी। जाँगर रोजे पेर,धरा करथौं धानी जी। बाँधे हवौं समुंद,कुँआ नदियाँ अउ नाला। बूता ले दिन रात,हाथ उबके हे छाला। सच मा हौं मजबूर,रोज महिनत कर करके। बिगड़े हे तकदीर,ठिकाना नइ हे घर के। थोरिक सुख आ जाय,बिधाता मोरो आँगन। महूँ पेट भर खाँव, पड़े हावँव बस लाँघन। घाम जाड़ आसाड़, कभू नइ सुरतावँव…

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दसवा गिरहा दमांद

जोतिस के जानकार मन ल नौ ले उपरहा गिनतीच नइ आवय। तेकर सेती जोतिस म नौ गिरहा माने गे हे। फेर लोकाचार म दस गिरहा देखे बर मिलथे। ओ दसवा गिरहा के नाँव हे दमांद। अलग -अलग गिरहा के अलग- अलग प्रभाव होथे। सबले जादा खतरा सनि ल माने गे हे। जेन हँं मनखे ल जादा ढेलवा -रहचुली झुलाथे। कोनो जब जादा परेसान हो जथे त कहिथे एकर उपर सनि चलत हे गा ! तेकर सेती पेरावथे बिचारा हँ। फेर ओकर ले जादा पेरूक तो दमांदमन होथे। एकर मतलब मैं…

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बेटी ऊपर भरोसा रखव

गांव के रंगमंच म रतिहा 8 बजे जेवन खा के सकलाय के हांका परत रहिस ।आज रमेसर के बेटी के आनजात होय के निपटान के बैइठक हे। रमेसर के बड़े बेटी कामनी ह पऊर कालेज पढ़ेबर सहर गय रहिस। रगी (गरमी) छुट्टी म आईस त मांग म सेंदुर, हाथ म चूरी पांव म माहुर लगा के दमांद धर के आगे।गांव म आनी बानी के गोठ होय लागिस। समेसर गांव समाज म अपन पीरा ल राखे खातिर बईटका बलाय रहिस।रतिहा सबो सियान मन लईकामन के ऊमर, राजीनामा ले बिहाव अऊ सरकारी…

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साहित्य हरे अंधरा के तसमा

मटमटहा राम हा नवा-नवा साहित्यकार बने रथे, ओकर लेखनी के चारो खुंट परसंसा होथे वोहा कम दिन मे ज्यादा नाम कमा डरथे, त वोला लागथे के वोहा सबे जिनिस ल जान डरे हे अऊ इही बात के घमंड में साहित्य ल बिन जाने समझे जेन मिले तेन ल साहित्य काय आय कइके पुछथे, वोहा सबले पहिली अपन संगवारी साहित्यकार मन ल पुछथे, त बड़ सुग्घर जवाब पाथे, एक झन कथे साहित्य तो अंतस के दरपन आय, फेर मटमटहा अपन घमंड पाय के जवाब ल नई समझे, वोहा दुसर संगवारी ल…

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जुग जुग पियव

भरे गरमी म , मंझनी मंझना के बेरा । जंगल म किंजरत किंजरत पियास के मारे मरत रहय भोलेनाथ । बियाबान जंगल म , मरे रोवइया नी दिखत रहय । तभे मनखे मन के हाँसे के अवाज सुनई दीस । अवाज के दिसा म पल्ला दऊड़िस । जवान जवान छोकरा छोकरी मन , रन्गरेली मनावत खावत पियत मसतियावत रहय । पहिली सोंचीस के ओकर मन के तीर म कइसे जांवव । पारवती मना करे रिहीस के , मनखे के रूप धर के झिन जा पिरथी म । जतका बेर तक…

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महतारी दिवस 14 मई अमर रहे : महतारी तोर महिमा महान हे

महतारी शब्द के अर्थ ला संसार के जम्मो जीव-जन्तु अउ परानी मन हा समझथें। महतारी के बिन ए संसार के कल्पना करना बिलकुल कठिन हे। महतारी हमन ला सिरिफ जनम भर नइ देवय बलकि करम ला घलाव सिखाथे। वो करम जेखर बिन हमर एक पाँव रेंगना असंभव होथे। मया पियार दुलार के संगे-संग अमोल संस्कार ला घलो सिखोथे। जिनगी जीये के बीज बोथे। नौ महीना लइका ला अपन ओदरा मा बोह के सरी बुता-काम ला सरलग करइया एके झन जीव ए जगत मा हे जेखर नाँव हरय महतारी हावय। वो…

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महतारी दिवस विशेष : दाई

दाई (चौपई छंद) दाई ले बढ़के हे कोन। दाई बिन नइ जग सिरतोन। जतने घर बन लइका लोग। दुख पीरा ला चुप्पे भोग। बिहना रोजे पहिली जाग। गढ़थे दाई सबके भाग। सबले आखिर दाई सोय। नींद घलो पूरा नइ होय। चूल्हा चौका चमकय खोर। राखे दाई ममता घोर। चिक्कन चाँदुर चारो ओर। महके अँगना अउ घर खोर। सबले बड़े हवै बरदान। लइका बर गा गोरस पान। चुपरे काजर पउडर तेल। तब लइका खेले बड़ खेल। कुरथा कपड़ा राखे कॉच। ताहन पहिरे सबझन हाँस। चंदा मामा दाई तीर। रांधे रोटी रांधे…

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महतारी दिवस विशेष : महतारी महिमा

महतारी महिमा (चौपई/जयकारी छन्द 15-15 मातरा मा) ईश्वर तोर होय आभास, महतारी हे जेखर पास। बनथे बिगङी अपने आप, दाई हरथे दुख संताप।।१ दाई धरती मा भगवान, देव साधना के बरदान। दान धरम जप तप धन धान, दाई तोरे हे पहिचान।।२ दाई ममता के अवतार, दाई कोरा गंगा धार। महतारी के नाँव तियाग, दाई अँचरा बने सुभाग।।३ काशी काबा चारों धाम, दाई देवी देवा नाम। दाई गीता ग्रंथ कुरान, मंत्र आरती गीत अजान।।४ भाखा बोली हे अनमोल, दाई मधुरस मिसरी घोल। महतारी गुरतुर गुलकंद, दाई दया मया आनंद।।५ दाई कागज…

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बिचार : नैतिकता नंदावत हे

आज में ह बजार कोती जात रहेंव, त रसता म मोर पढ़ाय दू-झिन लईका मिलिस, वोमा के एक झिन लईका ह मोला कहिथे- अउ गुरूजी, का चलत हे ? त तूरते दूसर लईका कहिथे- अउ का चलही जी, फाग चलही| अतका कहिके दुनोंझिन हांसत हांसत भगागे, में ह तो ये सब ल देख-सुन के सन्न रहिगेंव, देख तो! ये लईका मन ल, गुरूजी ल घलो नइ घेपत हे, मोर करा ये हाल हे त दूसर करा अउ का नइ कहत-करत होही| एक हमर जमाना रहिसहे, जब गुरूजी ल दुरिहा ले…

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