कहिनी : लंगड़ा भिखारी के इच्छा

शहर म एक झन लंगड़ा भिखारी रहय। जम्मो मनखे मन ओला लंगड़ा भिखारी कहिके पुकारय। भिखारी ह हमेशा खुसी-खुसी के जीवन बितावय, कभू घुस्सा नई करय। भिखारी शहर के दुरिहा म एक ठन झोपड़ी म राहय। झोपड़ी ह कुड़ा-करकट के ढेर के बीच म एक ठन पेड़ के तरी रहिस हे। लंगड़ा भिखारी के झोपड़ी म खाना पकाय के टूटे-फूटे बरतन अउ एक दू ठन चिरहा कपड़ा रहय। भिखारी ह हर दिन बिहनिया नहा-धो के आठ बजे ले अपन भोजन खातिर सहर के जम्मो दरवाजा म भीख मांगे बर जाय…

Read More

कहिनी : नोनी दुलौरिन

टूरी कहूं लछमी, त कहूं दुरगा देवी के रूप म जनम लेथे। डीह डोंगर, ससुरे-मईके दूनो कुल के मरियादा होथे। ये ह मोर अंगना के फूल-फुलवारी, मोर बेटी मोर हीरा ए। येला लिखाहूं-पढ़ाहूं बड़े साहेब बनाहूं, इही मोर डीह-डोंगर के दिया बरईया ए। खद्दर के छानी म, दूनो परानी, अपन जिनगी के सुख-दुख ल घाम छइहां के खेल सही खेलत राहय। बने-बने म समय बीतत जल्दी पहा जथे, सुख के दिन पांखी लगा के लऊहा उड़ा जथे। बर-बिहाव संग-संग गवन-पठौनी होगे। भगवान जाते सांठ चिन डरिस। उही दिन के आवत…

Read More

कहिनी : दहेज के विरोध

आज के ये दहेज प्रथा ह सुरसा रक्सिन कस मुंहुं ल उलाके हमर सइघो समाज ल लीलत हवय। ये दहेज रूपी सुरसा ले कोनो नी बांचत हे। फेर रामलाल सरपंच ह बजरंग बली कस दहेज रूपी सुरसा रक्सिन ले बांचे के उदिम करत हे। ‘खुरसी मन ल अभीन ले नी लाए हव रे निच्चट तुंगत हव’- रामलाल सरपंच ह, सामरतन बर तमकगे। सामरतन ह मुड़ी मं बोहे दरी ला भिंया म पटकिस अउ बतइस- ‘अकेल्ला महीं का करंव सरपंच?’ फुसकू घर तो गे रेहेंव दरी ल लाए बर। छट्ठी होय…

Read More

कहिनी : साहस एकता अउ संकल्प

कोनो कहिदिस, ‘गदहा’ अउ हम ‘गदहा’ बन जाबो? नहिं न? त फेर का सोचना, डरना। अतका बात याद रखव दुनिया म चाहे कतको बुराई राहय, बुरा होवय, मनखे ल अपन अच्छाई नई छोड़ना चाही। जीत अउ जय एक दिन अच्छाईच्च के होथे। त करना हे माने करना हे। बस, होगे? जगमग-जगमग उजियारा म, जिनगी के जम्मो आनंद, खुसी, जम्मो, उत्साह-जोस भरईया, मईया के नवरात्रि। दु:खी, डण्डी सबके दु:ख-भूख भाग जाथे। फेर वो गांव म घोर अंधियारी, सन्नाटा। कारन-दू बछर पहिली, एहि नवराति के तइयारी म बइठक म, झगरा मातगे राहय,…

Read More

कहिनी : धुरंधर महाराज

कपड़ा के नांव म कनिहा म नानकुन कपड़ा लटके के रिहिस। चुंदी छरियाय रिहिस। तन बिरबिट करिया। दांत निकले। जाड़ म लुद-लुद-लुद-लुद कांपत रिहिस। बही ह टक लगाके आगी तपइया सबो झन ल देखत रिहिस कांही नइ काहत रिहिस। फेर ओखर आंखी काहत रिहिस- ‘थोर किन महूं ल आगी तापन देतेव गा।’ नाक ल सकेलत धुरंधर महाराज कथे। येला भगाओ इहां ले। बिसेलाल गउंटिया, जगनू बर तमक गे- ‘तुंहरो बुता रे बाबू! निचट आलारैसी ताय। सुकवार के दिन अतका जड़ जग चालू होना हे अउ तुमन तुंगत हव। दूबी मां…

Read More

नान्हे कहिनी : लबारी

‘रामलाल कथे भाई मेहा दसमी पास होगेंव, ये ले मोर अंकसूची कहिके देखाय बर धरथे त देखथे पेपर ह ओकर ले गायब हो जाय रथे। वोला पेपर पढ़इया मन धरके लेग जाय रथे। रामलाल ल अड़बड़ दु:ख होथे। बिचारा के पीरा पहाड़ कस हो जथे।’ रामलाल बहुत खुश रिहिस अपन अंकसूची ल देखके वोला जतन के पेपर म तोप के अपन दुकान म लइस अपन बड़े भाई ल देखाये बर, भाई दुकान म नई राहे। अपन भाई के रद्दा जोहत-जोहत अंकसूची ल टेबुल म मड़ा दिस। ओखर भाई ह आ…

Read More

नान्हे कहिनी : सिसटाचार

गियारह बजे के बेरा आय। मिथलेस अपन संगवारी मनसन गोठियात जात राहे, त परकास कथे-कइसे रे मिथलेस ! तेंहा अड़बड़ दिन बाद कॉलेज आय हाबस। आजकल तोर दरसन दुरलभ होगे हाबे। कहां जाथस दिखस निही। त मिथलेस कथे- बहुत बियस्त होगे हाबों यार, सबो डाहर ल देखे ल पड़थे घर डाहर घलो अड़बड़ बूता रथे। सबो झन पढ़इया लइका मन अपन-अपन किलास म जात रथे। ओतकीच बेर कॉलेज के प्रिंसपल ह आ जथे, अउ मिथलेस ल देखके कथे- ‘आप मेरे आफिस में आइए।’ मिथलेस ह कोन ल काहत हे कहिके…

Read More

कहिनी – नवा अंजोर

नोनी मैं तो आन धर के छईहां नई खुंदे रहें, बुता करई तो जानते नई रहें। फेर मोर आदमी के बीते म जीनगी के ताना नना होगे। घर चलाय बर गहना गूंठा तक बेचागे। माय मइके मैं दिन के चार दिन बने राखही तहां…। नानमुन गोठ ह हूल मारे कस लागथे। एही पाय के मैं मिस्टरी बबा अउ रउतईन दाई संग-संग रांधे करे के काम करे लागे। कोनो काम छोटे बड़े नई होवै। काम करे म का के लाज। गांव के सियान मन कहिथें- परवार के बड़े अउ छोटे ल…

Read More

शिवशंकर शुक्‍ल के कहिनी

एक गांव मा एक बनिया रहत रहिस । ओखर मन करिस त वो ह परदेस कमाय बर निकल गिस ।दूसर देश म जाके बनिया ह गजबेच्चओ धन कमाईस । फेर धन के भोरहा म वो ह अपन नोनी बाबू ल नई भुलाईस । बनिया ह अपन कमई के जन दोगानी मोटरिया के अपन गांव लहुटे बर तियार होगे । फेर वो ह मने मन गुनिस के घर अमरे के पहिली चिठी डार दौं त घर मा परवार के जम्मो झिन सकला जाहीं । अईसे गुन के बनिया ह गांव बर…

Read More

डॉ. सम्पूर्णानन्द के आस्था : नान्हे कहिनी

स्वाधीनता सेनानी डॉ. सम्पूर्णानंद के अपन देस के संस्कृति म खूब सरधा रहिस। वोकर इच्छा रहिस के हमर देस ह राजनीति भर म नहीं भलुक संस्कृति जेन हमर देस के हे वोहू म तरक्की करय अउ स्वतंत्र भारत म भारतीय सिक्षा नियम लागू होवय। देस जइसने आजाद होइस। डॉ. सम्पूर्णानंद उत्तर परदेस के सिक्षा मंत्री बनिस। वोकर कार्यकाल म कोनो बिस्वविद्यालय के कुलपति वोकर सोज मिले बर आइस। डॉ. साहेब उंकर संग शिक्षा भारत म कइसे दे जाय ये बिसे मे बातचीत सुरू करिन। उन कहिन- अंग्रेज मन जेन पध्दति…

Read More