Tag: Jitendra Verma Khairjhitiya

गीत : सावन महीना

सावन आथे त मन मा, उमंग भर जाथे।
हरियर हरियर सबो तीर, रंग भर जाथे।

बादर ले झरथे, रिमझिम पानी।
जुड़ाथे जिया, खिलथे जिनगानी।
मेंवा मिठाई, अंगाकर अउ चीला।
करथे झड़ी त, खाथे माई पिला।
खुलकूद लइका मन, मतंग घर जाथे।
सावन आथे त मन मा….. ।

भर जाथे तरिया, नँदिया डबरा डोली।
मन ला लुभाथे, झिंगरा मेचका बोली।
खेती किसानी, अड़बड़ माते रहिथे।
पुरवाही घलो, मतंग होके बहिथे।
हँसी खुसी के जिया मा, तरंग भर जाथे।
सावन आथे त मन मा….. ।

होथे जी हरेली ले, मुहतुर तिहार।
सावन पुन्नी आथे, राखी धर प्यार।
आजादी के दिन, तिरंगा लहरथे।
भोले बाबा सबके, पीरा ल हरथे।
भक्ति म भोला के सरी, अंग भर जाथे।
सावन आथे त मन मा….. ।

चिरई चिरगुन चरथे, भींग भींग चारा।
चलथे पुरवाही, हलथे पाना डारा।
छत्ता खुमरी मोरा, माड़े रइथे दुवारी।
सावन महीना के हे, महिमा बड़ भारी।
बस छाथे मया हर, हर जंग हर जाथे।
सावन आथे त मन मा….. ।

जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”
बाल्को (कोरबा)

गीत : जिनगी के गाड़ा

जिनगी के गाड़ा ल, अकेल्ला कइसे तिरौं।
उल्ला धुरहा हवै रे, मुड़भसरा मैं गिरौं।

काया के पाठा, पक्ति पटनी ढिल्ला।
बेरा हा कोचे, तुतारी धर चिल्ला।
धरसा मा भरका, काँटा खूँटी हे।
बहरावत नइ हे, बाहरी ठूँठी हे।
गर्मी म टघलौं, त बरसा म घिरौं——।
उल्ला धुरहा हवै रे, मुड़भसरा मैं गिरौं।




भारा बिपत के , भराये हे भारी।
दुरिहा बियारा , दुरिहा घर बारी।
जिम्मेवारी के जूँड़ा म, खाँध खियागे।
बेरा बड़ बियापे , घर बन सुन्ना लागे।
हरहा होके इती उती, भटकत फिरौं—।
उल्ला धुरहा हवै रे, मुड़भसरा मैं गिरौं-।

सबझन बिजराथे, पाके अकेल्ला।
धरके घुमत रहिथौं, हरदी तेल ला।
दुरिहा डहर घलो, संगी संग कटही।
मया पीरा मोर, दूनो झन म बँटही।
झिरिया के पानी कस, आसा ले झिरौं–।
उल्ला धुरहा हवै रे, मुड़भसरा मैं गिरौं–।

जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया”
बाल्को(कोरबा)
09981441795