कलाकार के कला के नई रहिगे हे मोल

[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] अभी के बेरा म छत्तीसगढ़ म कला के कमी नई हे अउ कलाकार मन के घलोक कमी नई हे, फेर कला के मान करईया मन के कमी होंगे हे। अब सब झन कला या कलाकार ल पइसा म तौलथे, ओखर जीवन भर के महेनत सम्मान के कोई अहेमियत नई समझे। छत्तीसगढ़ के भासा ल सविधान म सामिल नई करे गे हे तेखर कारन ईहा के कलाकार जेन मन अपन महतारी भाखा म अपन कला ला बगरावत हे तेखरो कमे पुछैया हे,तेखर सेती अतका…

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ररुहा सपनाये …….

[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] सरग म बरम्हा जी के पांच बछर के कारकाल पुरा होगे । नावा बरम्हा चुने बर मनथन चलत रहय । सत्ताधारी इंद्र अपन पारटी अऊ सहयोगी मन के बीच घोसना कर दीस के , ये दारी दलित ला बरम्हा बनाना हे । जबले बरम्हा चुनई के घोसना होये रहय , हमर गांव के मनखेमन मरे बर मरत रहय । जलदी मरबो सोंचके , खेती किसानी के समे , काम बूता खाये पिये ला घला तियाग दीन अऊ दसना म परे परे जमदूत के…

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सावन के सवागत हे

बादर बदबदावत हे,बरसा बरसावत हे। अमरित अमावत हे,सावन के सवागत हे। गली-खोर मा चिखला, नांगर,भँइसा-बइला । खेती-खार,मुँही-टार, नसा चढगे सबला ।। जाँगर ला जगावत हे,करम ला कमावत हे। अमरित अमावत हे,सावन के सवागत हे ।।१ बादर बदबदावत हे,बरसा बरसावत हे।। चुहय छानी-परवा, छलकै नदिया-नरवा। दबकै चिरई-चाँटी , दउङै गाय-गरूवा ।। माटी ममहावत हे,चंदन जइसे लागत हे। बादर बदबदावत हे,बरसा बरसावत हे।।२ अमरित अमावत हे,सावन के सवागत हे।। हरियर धरती धानी, सकेलय सुग्घर पानी। जुच्छा हावय बिन जल, जीव जगत जिनगानी।। भुँइयाँ पियास बुतावत हे,छाती जुड़ावत हे। अमरित अमावत हे,सावन के…

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सहे नहीं मितान

घाम जाड़ असाड़ मा,सेहत के गरी लहे नही मितान। खीरा ककड़ी बोइर जाम बिही,अब सहे नहीं मितान। बासी पेज चटनी मोर बर, अब नाम के होगे हे। खाना मा दू ठन रोटी सुबे,अउ दू ठन साम के होंगे हे। उँच नीच खाये पीये मा, हो जाथे अनपचक। कूदई ल का कहँव,रेंगई मा जाथे हाथ गोड़ लचक। जुड़ घाम मा जादा झन,जायेल केहे हे। गरम गरम बने पके चीज,खायेल केहे हे। धरे हौं डॉक्टर ,चलत हे रोज इलाज। बस बीते बेरा ल,सोचत रहिथों आज। एक कन रेंगे मा,जाँगर थक जाथे। सुस्ती…

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सावन बइरी (सार छंद)

चमक चमक के गरज गरज के, बरस बरस के आथे। बादर बइरी सावन महिना, मोला बड़ बिजराथे। काटे नहीं कटे दिन रतिहा, छिन छिन लगथे भारी। सुरुर सुरुर चलके पुरवइया, देथे मोला गारी। रहि रहि के रोवावत रहिथे, बइरी सावन आके। हाँस हाँस के नाचत रहिथे, डार पान बिजराके। पूरा छंद ये कड़ी म पढ़व..

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सोनहा सावन सम्मारी

सोनहा समे हे सावन सम्मारी, भजय भगद हो भोला भण्डारी। सोनहा समे हे सावन सम्मारी, भजय भगद हो भोला भण्डारी।। नीलकंठ तोर रूप निराला, साँप-डेरू के पहिरे तैं माला। जटा मा गंगा,माथ मा हे चंदा, अंगरक्खा तोर बघवा छाला।। भूत,परेत,नंदी हे संगवारी। सोनहा समे हे सावन सम्मारी।।१ भजय भगद हो भोला भण्डारी।। कैलासपती तैं अंतरयामी, तीन लोक के तैं हर सुवामी। सिचरन संग सकती साजे, देबी देवता के तैं देव धामी।। जगत म जबर तैं जटाधारी। भजय भगद हो भोला भण्डारी।।२ सोनहा समे हे सावन सम्मारी।। सिव संगीकर बड़ बरदानी,…

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शिवशंकर के सावन सम्मार

[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] हमर हिन्दू पंचांग के दिन तिथी के नामकरन हा कोनो ना कोनो देवी-देवता मन ले जुड़े हावय। सब्बो सातो दिन के नाँव के कथा हा अलग-अलग हावय। सनातन धरम मा जम्मों तिथी के नाँव हा देवता मन ले जुड़े मिलथे। सातो दिन पहिली मा सबले पहिली दिन इतवार के संबंध भगवान सूरुज नरायन ले माने जाथे। तीसरइया दिन मंगलवार के संबंध हा संकट मोचन हनुमान ले माने जाथे। कोनो कोनो जघा मा कोनो कोनो मन हा ए दिन गनेस देवता के दिन मानथे।…

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सावन

व्याकुलता छाए हे तन मन मा अकुलित हम सब यौवन मा जम्मो कति बादर आ गे नाचत हे मजूर अब वन मा आकुल मन शांत हो गे हे बुढवा के चौपाल खो गे हे गावत हे डाल मा सुअन धरती के पियास बुझाय बर आ गे हे सावन मरूस्थल मा छाए हे हरियाली थक हार के बइठे तपन महाबली माटी के खुषबू मनभावन पियास बुझाए बर धरती के आ गे हे सावन चिखला फइले हे चहुॅंओर आवत हावय घटा घनघोर आंखि खोल उठ गे हे सुमन पियास बुझाए बर धरती…

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गुरू-पून्नी

[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] गुरू के महत्तम बर संत मन के कहना हे के यदि बरम्हा-बिस्नु-महेस ह ककरो ले घुस्सा होगे हे त ओकर ले ये दुनिया म एक-अकेल्ला गुरू ही हे जउन ह तिरदेव के घुस्सा ले बचा सकत हे, फेर यदि गुरू ककरो बर घुस्सा होगे त ये दुनियां म अइसन कोन्हों नइहे जउन ह गुरू के घुस्सा ले बचा सकय, तिरदेव मन घलो नइ बचा सकय| गुरू-पुन्नी के सुघ्घर पबरीत बेरा म आवव गुरू काला कहिथे अउ गुरू के परकार के होथे, ओकर बारे…

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खुमरी : सरसी छंद

बबा बनाये खुमरी घर मा,काट काट के बाँस। झिमिर झिमिर जब बरसे पानी,मूड़ मड़ाये हाँस। ओढ़े खुमरी करे बिसासी,नाँगर बइला फाँद। खेत खार ला घूमे मन भर,हेरे दूबी काँद। खुमरी ओढ़े चरवाहा हा, बँसुरी गजब बजाय। बरदी के सब गाय गरू ला,लानय खार चराय। छोट मँझोलन बड़का खुमरी,कई किसम के होय। पानी बादर के दिन मा सब,ओढ़े काम सिधोय। धीरे धीरे कम होवत हे,खुमरी के अब माँग। रेनकोट सब पहिरे घूमे, कोनो छत्ता टाँग। खुमरी मोरा के दिन गय अब,होवत हे बस बात। खुमरी मोरा मा असाड़ के,कटे नहीं दिन…

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