विष्णुपद छंद : हे जग के जननी

जुग जुग ले कवि गावत हावँय,नारी के महिमा। रूप अनूप निहारत दुनिया, नारी के छवि मा। प्यार दुलार दया के नारी,अनुपम रूप धरे। भुँइया मा ममता उपजाये,जम के त्रास हरे। जग के खींचे मर्यादा मा, बन जल धार बहे। मातु-बहिन बेटी पत्नी बन,सुख दुख संग सहे। मीथक ला लोहा मनवाये,नव प्रतिमान गढ़े। पुन्न प्रताप कृपा ला पाके,जीवन मूल्य बढ़े। धरती से आगास तलक ले, गूँजत हे बल हा। तोर धमक ला देख दुबक गे,धन बल अउ कल हा। नारी क्षमता देख धरागे, अँगरी दाँत तरी। जनम जनम के मतलाये मन,होगे…

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तिंवरा भाजी

तिंवरा भाजी दार संग , अब्बड़ मिठाथे । दू कंऊरा भात ह संगी, जादा खवाथे । उल्हा उल्हा भाजी ह, बड़ गुरतुर लागथे । मिरचा लसून संग , जब फोरन में डारथे । नान नान लइका मन , चोराय बर जाथे । झोला झोला धरथे अऊ, मुँहू भर खाथे । ओली ओली टोर के, भौजी ह धरके लाथे । पेट भर भात ल भैया, चांट चांट के खाथे । हरियर हरियर देख के, गाय बेंदरा जाथे । कतको रखवारी करबे, राहीछ मताथे । थोर थोर खाय ले , भाजी अब्बड़…

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विष्णुपद: छंद – मोखारी

बबा लाय हे दतवन नोनी,दाँत बने घँसबो ! जीभ सीप के कुल्ला करबो,कुची फेंक हँसबो !!1!! बनतुलसा बर बोइर बमरी,टोर लन चिरचिरा ! करंच मउहाँ सब्बो दतवन,लीम हे किरकिरा !!2!! बमरी सोंटा के मोखारी,गाँव-गाँव चलथे ! घड़ी-घड़ी मा खेलत खावत,आज कल निकलथे !!3!! हँसिया बाँधै डँगनी धरके,दतवन अभी मिलही ! लाम छँड़ा ला टोरै सब्बो,दाँत तभे खिलही !!4!! नवा जमाना धरके आगे,टूथ ब्रस घँसरबे ! टूथ पेस्ट तो रइथे बढ़िया,देख तहूँ फँसबे !!5!! मजा कहाँ जी दतवन जइसन,करू लीम बमरी ! दाई बाबू माँगत हावै,चलना जी लमरी !!6!! बैकटेरिया मरथे…

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सुरता : जन कवि कोदूराम “दलित”

अलख जगाइन साँच के,जन कवि कोदू राम। जन्म जयंती हे उँकर,शत शत नमन प्रणाम। सन उन्नीस् सौ दस बछर,जड़ काला के बाद। पाँच मार्च के जन्म तिथि,हवय मुअखरा याद। राम भरोसा ए ददा, जाई माँ के नाँव। जन्म भूमि टिकरी हरै,दुरुग जिला के गाँव। पेशा से शिक्षक रहिन,ज्ञान बँटइ के काम। जन्म जयंती हे उँकर,शत शत नमन प्रणाम। राज रहिस अंगरेज के, देश रहिस परतंत्र। का बड़का का आम जन,सब चाहिन गणतंत्र। आजादी तो पा घलिन, दे के जीव परान। शोषित दलित गरीब मन,नइ पाइन सम्मान। जन-मन के आवाज बन,हाथ…

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सब हलाकानी हे

ददा के गोठ ल बेटा नइ भावय। घरो घर सास अउ बहू के कहानी हे। कतेक ल बताबे मितान? सब हलाकानी हे!!! लटपट लटपट टुरा दसमी पढे हे। बिहाव बर छोकरी खोजे म परसानी हे। कतेक ल बताबे मितान? सब हलाकानी हे!!! फोकट के जिनिस म घर-पेट भरत हन। अलाली म बितत हमर जिनगानी हे। कतेक ल बताबे मितान? सब हलाकानी हे!!! अरोसी-परोसी संग गोठ-बात बंद हे। फेर दुनियाभर संग मितानी हे। कतेक ल बताबे मितान? सब हलाकानी हे। रीझे यादव टेंगनाबासा छुरा [responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”]

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सर्वगामी सवैया : पुराना भये रीत

(01) सोंचे बिचारे बिना संगवारी धरे टंगिया दूसरो ला धराये। काटे हरा पेंड़ होले बढ़ाये पुराना भये रीत आजो निभाये। टोरे उही पेंड़ के जीव साँसा ल जे पेंड़ हा तोर संसा चलाये। माते परे मंद पी के तहाँ कोन का हे कहाँ हे कहाँ सोरियाये। (02) रेंगौ चुनौ रीत रद्दा बने जेन रद्दा सबो के बनौका बनावै। सोचौ बिचारौ तभे पाँव धारौ करे आज के काल के रीत आवै। चाहौ त अच्छा हवै एक रद्दा जँचै ता करौ नीव आजे धरावै। कूड़ा उठा रोज होले म डारौ ग होले…

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कुकुर के महिमा

भईगे महुं ल कुछु, बोले बर नई मिलिस त सोचेंव, चल बाहिर म हवा खा आवं, बिहनचे उठेंव, बिन दतुन मुखारी घसे, किंदरे कस निकल गयेंव। रददा म काय देखत हंव!!! द दा रे आनि-बानि के टुकुर टुकुर देखत मनखे असन फबित ओन्हा पहिरे, कुकुर…, कोउनो कबरा, त कोउनो बिलवा त कोउनो भुरवा…. मने मन म कहेव.. कस ग भगवान मोला तै ह काबर मनखे जनम देहे ग, महु ल दईसनेहे कुकुर नई बना देतेस!!! आगू गें, त दू झिन संगी मन, कुकुर ल संकरी म बांधे गोठियावत रहें, त…

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मोर महतारी

मोर महतारी बढ़ दुलारी, मया हे ओखर मोर बर भारी। अंचरा म रखे के मोला, झुलाथे मया के फुलवारी। महेकत रइथे मोर दाई के, घर अंगना अउ दुवारी।।। जग जानथे महतारी ह, होथे सब्बो ल प्यारी। कोरा म धर के लइका ल, जिनगी करथे उज्यारी। मोर महतारी बढ़ दुलारी, मया भरे हे ओखर म भारी। अनिल कुमार पाली तारबाहर बिलासपुर छत्तीसगढ़। प्रशिक्षण अधिकारी आई.टी.आई मगरलोड धमतरी। मो.न.-7987766416 ईमेल:- [email protected] [responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”]

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अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस म दोहा : बेटी

दोहा (बेटी) झन मारव जी कोख मा ,बेटी हे अनमोल। बेटी ले घर स्वर्ग हे, इही सबो के बोल।।1।। बेटी मिलथे भाग ले,करव इँकर सम्मान। दू कुल के मरजाद ये,जानव येहू ज्ञान।।2।। बेटी आइस मोर घर,गज़ब भाग हे मोर। घर पूरा खुशहाल हे,जुड़े मया के डोर ।।3।। बेटी ला सम्मान दव, ये लक्ष्मी के रूप। बेटी छइँहा कस चलय,गर्मी हो या धूप।।4।। मनखे मन करथे जिहाँ, नारी के सम्मान। करथे लक्ष्मी वास जी, सुखी रथे इंसान।।5।। काली,दुर्गा,शारदा, सबो करय उद्धार। बेटी कतका रूप मे,जग के पालनहार।।6।। माँ,बेटी,अर्धांगिनी,कभू बहन के रूप।…

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छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय – जनकवि कोदूराम “दलित”

(108 वाँ जयंती मा विशेष) 1717 ईस्वी मा जन्में गिरधर कविराय अपन नीतिपरक कुण्डलिया छन्द बर जाने जाथें। इंकर बाद कुण्डलिया छन्द के विधा नँदागे रहिस। हिन्दी अउ दूसर भारतीय भाखा मा ये विधा के कवि नजर मा नइ आइन। पठान सुल्तान, जुल्फिकार खाँ, पंडित अम्बिकादत्त व्यास, बाबा सुमेर सिंह, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, मन सुप्रसिद्ध कवि के दोहा के भाव मा विस्तार दे के अउ रोला जिद के ये विधा ला पुनर्स्थापित करे के कोशिश जरूर करिन। हास्य कवि काका हाथरसी घलो कुण्डलिया जइसे दोहा अउ रोला मिलाके छै डाँड़ के…

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