नान्‍हे कहिनी : आवस्यकता

जब ले सुने रहिस,रामलाल के तन-मन म भुरी बरत रहिस। मार डरौं के मर जांव अइसे लगत रहिस। नामी आदमीं बर बदनामी घुट-घुट के मरना जस लगथे। घर पहुंचते साठ दुआरीच ले चिल्लाईस ‘‘ललिता! ये ललिता!‘‘ ललिता अपन कुरिया मं पढ़त रहिस। अंधर-झंवर अपन पुस्तक ल मंढ़ाके निकलिस। ‘‘हं पापा!‘‘ ओखर पापा के चेहरा, एक जमाना म रावन ह अपन भाई बिभिसन बर गुसियाए रहिस होही, तइसने बिकराल दिखत रहिस। दारू ओखर जीभ मं सरस्वती जस बिराजे रहिस अउ आंखी म आगी जस। कटकटावत बोलिस ‘‘मैं ये का सुनत हौं…

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नान्हे कहिनी – फुग्गा

लच्छू अपन नानकुन बेटी मधु ला धरके मड़ई देखायबर लाय हे।लच्छू के जिनगी गरीबी मा कटत हे। खायबर तो सरकार हा चाउँर दे देथय।फेर गाँव मा काम बूता हाथ मा नइ रहे ले एकक पइसा बर तरसत रहिथे। आज गाँव के मड़ई हे।एसो बहुतेच भीड़ हवय। काबर कि एसो मड़ई के दिन सरकारी छुट्टी घलो पड़गे हवय। गाँव के जतका सरकारी नौकरी करइया मन सहर मा रहिथे सबो मन परिवार संग मड़ई मानेबर आय हवय। गाँव के मड़ई मा बेटी दमाद ,समधी सजन सबो मन आय हे। माता देवाला अउ…

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नान्‍हे कहिनी : नवा बछर के बधाई

नवा साल के नवा बिहनिया राहय अउ सुग्घर घाम के आनंद लेवत “अंजनी” पेपर पढ़त राहय। ओतके बेरा दरवाजा के घंटी ह बाजथे। “अंजनी” पेपर ल कुरसी म रख के दउड़त दरवाजा ल खोलथे।”अंजनी” जी काय हालचाल कइसे हस ? “अंजनी” (सोचत-सोचत)”जी ठीक हँव।” फेर मँय आप मन ल चिनहत नइ हँव ? अइ…..अतका जलदी भुला गेव ? मँय “नीलिमा” तोर कांलेज वाले संगवारी। वोह…..! अरे…..”नीलिमा” तँय। तँय तो अतका बदल गेस की चिनहाबे नइ करत हस।ले आवा भीतर म बइठव। अउ सुनावा काय काम बूता चलत हे आजकल। ये…

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लघुकथा-किसान

एक झन साहब अउ ओकर लइका ह गांव घूमे बर आइन।एक ठ खेत म पसीना ले तरबतर अउ मइलाहा कपडा पहिर के बुता म रमे मनखे ल देखके ओकर लइका पूछथे-ये कोन हरे पापा? ये किसान हरे बेटा!!-वो साहब ह अपन बेटा ल बताइस। ‘ये काम काबर करत हे पापा?’ “ये अन्न उपजाय बर काम करत हे बेटा!” ‘ये मइलाहा कपडा काबर पहिरे हे पापा?’ “ये गरीब हे ते पाय के अइसन कपडा पहिरे हे बेटा!” ‘अच्छा!!त किसान ह गरीब होथे का पापा?’ “हहो!हमर देस के जादातर किसान गरीब हे…

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लघु कथा – सोज अंगुरी के घींव

ककछा म गुरूजी हा, हाना के बारे म पढ़हावत पढ़हावत बतावत रहय के, सोज अंगुरी ले घींव नी निकलय। जब घींव निकालना रहिथे तब, अंगुरी ला टेड़गा करे बर परथे। एक झिन होसियार कस लइका किथे – गुरूजी ये हाना हा जुन्ना अऊ अपरासांगिक हो चुके हे, अभू घींव हेरे बर अंगुरी ला टेड़गा करे के आवसकता नी परय। गुरूजी किथे – तैं हमर ले जादा जानबे रे …….., कती मनखे, कती तिर, सोज अंगुरी म घींव निकाल सकथे ……….. ? तैं बता भलुक, महूं सुनव ………। लइका किथे –…

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छत्तीसगढ़ महतारी

बड़े बिहनिया उठ जा संगी खेत हमर बुलावत हे, पाके हावय धान के बाली महर महर महकावत हे। टप टप टपके तोर पसीना माथा ले चुचवावत हे, तोर मेहनत ले देखा संगी कई झन जेवन पावत हे। ये धरती ह हमर गिंया सबके महतारी ये कोरा म रखके सब ल पोषय एहि हमर जिंदगानी ये। अपन करम ले सरग बनाबो माटी हमर चिन्हारी ये बड़े भाग ले जन्म मिलिस छत्तीसगढ़ महतारी ये। अविनाश तिवारी

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नान्हे कहिनी- बेटी अउ बहू

एक झन दूधवाला ह अपन गिराहिक कना दूध लेके जाथे त एकझन माइलोगिन ह दूध ल झोंकाथे। पहिली दिन- ‘उपराहा दूध कोन मंगाय हे गा! काबर अतेक दूध देवत हस?’ वो माइलोगिन ह पूछिस। “भऊजी ह देबर केहे हे दाई!” दूध वाला ह बताइस। ‘का करही वोहा अतेक दूध ल!!’ “दाई! भउजी ह बतावत रिहिसे ओला डॉक्टर ह दूध संग म दवाई पीये बर केहे हे। ते पाय के आधा किलो उपराहा दूध मंगाय हे।” ‘अउ ओकर पैसा ल का ओकर बाप ह दिही! झन दे उपराहा दूध। हमर घर…

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कहानी – देवारी के कुरीति

गाँव म देवारी के लिपई-पोतई चलत रिहिस। सुघ्घर घर-दुवार मन ल रंग-रंग के वारनिश लगात रहिस। जम्मो घर म हाँसी-खुशी के महौल रिहिस। लइका मन किसम-किसम के फटाका ल फोरत रिहिस। एक झन ननकी लइका ह अपन बबा संग म घर के मुहाटी म बइठे रिहिस। ओ लइका ह बड़ जिग्यासु परवित्ति के रहिस। लइका मन ह बड़ सवालिया किसम के रहिथे। उदुक के अपन बबा ले पूछिस – बबा हमन देवारी तिहार ल कब ले अऊ काबर मनाथन। बबा ह ओ लइका ल राम भगवान के अयोद्धया लहुटे के…

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नान्हे कहिनी – सवाल

‘बबा!ये दिया काबर बरत हे?’ ‘अंजोर करे खातिर बरत हे बेटा!!’ बबा ह अपन नाती ल समझावत बताइस। ताहने ओकर नाती ह फेर एक ठ सवाल पूछथे- ‘ये अंजोर काकर बर हरे बबा?’ ‘जेन ह ओकर अंजोर के फयदा उठाही तेकर बर!!’ ‘एमा दिया के का फयदा हे बबा?’ ‘एमा दिया के कोनो फयदा नीहे बेटा!’ ‘एमा दिया के फयदा नीहे त काबर बरत हे? बबा!’ ‘दिया के बुता हरे बेटा! अपन फयदा-नुकसान के चिंता ल छोडके ओहा सरलग बरत रहिथे।’ ‘जब नानकुन दिया ह अपन स्वारथ के चिंता ल…

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कहानी : बड़का तिहार

गुरूजी पूछथे – कते तिहार सबले बड़का आय ? समझ के हिसाब से कन्हो देवारी, दसरहा अऊ होली, ईद, क्रिसमस, त कन्हो परकास परब ला बड़का बतइन। गुरूजी पूछथे – येकर अलावा ……? लइका मन नंगत सोंचीन अऊ किथे – पनदरा अगस्त अऊ छब्बीस जनवरी। कालू हा पीछू म कलेचुप बइठे रहय। गुरूजी पूछथे – तैं कुछु नी जानस रे ? ओला तिर म बलइस। कालू हा अपन चैनस के आगू कोती ला, पेंठ म खोंचे रहय, पीछू कोती, चैनस हा पेंठ ले बाहिर रहय। ओकर बिचित्र पहिनावा देख, लइका…

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