–वीरेन्द्र ‘सरल‘ एक गाँव म एक गरीब लेड़गा रहय। ये दुनिया म लेड़गा के कोन्हों नइ रिहिस। दाई रिहिस तउनो ह कुछ समे पहिली गुजर गे। लेड़गा ह बनी-भूती करके भाजी-कोदई, चुनी-भूंसी खाके अपन गुजर बसर करत रहय। सम्पत्ति के नाव म लेड़गा के एक झोपड़ी भर रहय तब उही झोपड़ी के आधा म पैरा के खदर छानी रहय अउ आधा ह अइसने खुल्ला। एक ठन गाय रहय जउन ह आधा भीतरी तब आधा बहिरी बंधाय। एक ठन हउला रहय तहु ह नो जगह ले टोड़का रहय जउन ला लाख…
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दोखही के दुख (लघु कथा)
सुखिया के बिहाव ह जेन दिन लगिस उही दिन ले सुखिया के आंखी मं बिहाव के नेंग-जोंग ह आंखी-आंखी मं झूलत रहिस,कइसे मोर तेल चढ़ही, कइसे माइलोगिन मन सुघ्घर बिहाव गीत गाही, कइसे भांवर परही, कइसे मोर मांग ल मोर सइया ह भरही, तहान जिनगी भर ओकर हो जाहूं अउ ओकरे पाछू ल धर के ससुराल मं पांव ल रखहूं, सास-ससुर, जेठ-जेठानी, देवर- नंनद ह मोर सुवागत करही अउ नान-नान लइका मन ह भउजी, काकी, बड़े दाई, मामी कहिके मोला पुकारही अउ कइसे मोर मयारू ह मोला मया के बंधना…
Read Moreलोक कथा : लेड़गा मंडल
– वीरेन्द्र ‘सरल‘ एक गांव म एक झ लेड़गा रहय। काम बुता कुछ नइ करय। ओखर दाई ओला अड़बड़ खिसयावय। लेड़गा के दाई जब सियान होगे अउ लेड़गा जवान, तब रिस के मोर डोकरी ओला अड़बड़ गारी-बखाना दिस। लेड़गा हाथ जोड़के किहिस-‘‘ले दाई अब जादा झन खिसया। काली ले महुं कुछु बुता काम करके चार पैसा कमा के तोर हाथ में दुहूं। डोकरी खुश होगे अउ बिहान दिन आज मोर बेटा ह कमाय बर जाही कहिके लेड़गा बर सात ठन मुठिया रोटी रांध के मोटरी म जोर दिस। लेड़गा रोटी…
Read Moreसेठ घर के नेवता : कहिनी
रमेसर अपन छोटे बेटी के चइत मा बिहाव बखत अड़बड़ खुस रहिस। जम्मो सगा सोदर,नत्ता गोत्ता, चिन पहिचान,अरपरा परपरा ल नेवता देय रहिस।सबो मन आय घलाव रहिस।सहर के सबले बड़े सेठ ला घलो नेवता दिस। ओकर संग बीस बच्छर पहिली जब नानकुन नवा दुकान धरिस तब ले लेन देन चलत हे। आज ओकर दुकान बीस गुना बाढ़ गे हवय। सुजी से लेके कुलर फ्रिज,कपड़ा लत्ता, बरतन अउ सोन चांदी सबो मिलथे। रमेसर के घर बिहाव के जम्मो जिनिस ओकरे दुकान ले आय रहिस। सेठ ह नेवता के मान राखिस अउ…
Read Moreपरेम : कहानी
साकुर चैनल ल एति-तेति पेले असन करके बिकास पीठ म ओरमाये अपन बेग ल नहकाइस। बैंक भीतर पांव रखते साठ, अहा! कतका सुघ्घर गमकत, ममहावत ठंढा! जइसे आगि म जरे ल घीव म नहवा दिस। भाटा फूल रंग के पुट्टी अउ गाजरी रंग के पट्टी नयनसुख देवत रहिस। बिकास दूनों बाजू, एरी-डेरी, नजर दौडाइस।खास पहिचान के कोनों नइ रहिन। सब दूर के रिस्तेदार, डहरचलती पहिचान के,जेखर संग फटफटी म बइठे अइसने राम रमौआ हो जात रहिस। बिकास हाथ उठा के, हिलाके एकात झन ल हाय-हलो, राम-राम करिस।बैंक खचाखच भरे रहिस,…
Read Moreआज के बड़का दानव
अभिच कुन के गोठ हवै। हमर रयपुर म घाम ह आगी कस बरसत रिहिस, जेखर ले मनखे मन परसान रिहिस। मेहा एक झन संगवारी के रद्दा देखत एक ठन फल-फूल के ठेला के तीर म बैठै रहव। ओ ठेला वाला करा अब्बड झन मनखे मन आतिस, अऊ अपन बड़ महँगा जिनिस लेके चल देवय। आप मन ह सोचत होहू कि फल-फूल वाला करा काय महाँगी समान होही? ओ समान रिहिस गुटका, बीड़ी, माखुर, सिगरेट, जरदा जैसे निशा के समान। असल म वो ठेला वाला मेर फल-फूल, कुरकुरे-पापड़ी के संग म…
Read Moreडॉ.शैल चंद्रा के किताब : गुड़ी ह अब सुन्ना होगे
संगी हो ये किताब ल बने सहिन पीडीएफ बनाए नइ गए हे, तभो ले डॉ.शैल चंद्रा जी के रचना मन के दस्तावेजीकरण के उद्देश्य से येला ये रूप में हम प्रस्तुत करत हवन। पाछू प्रकाशक या टाईप सेट वाले मेरे ले सहीं पीडीएफ या टैक्स्ट फाईल मिल जाही त वोला प्रकाशित करबोन। 1. सहर के गोठ 14. नंदागे लडकपन 27. भगवान के नांव म 40. आज के सरवन कुमार 2. बैसाखू के पीरा 15. फायदा 28. पढंता बेटा 41. इक्कीसवीं सदी के गंधारी 3. अपन-अपन भाग 16. आज के सीता…
Read Moreकहानी – बड़की बहू
कमला के बिहाव होय 24 बच्छर होगे हे।ओ हा अपन बड़े नोनी के बिहाव घलाव कर डारिस।ओकर नानकुन बेटी नतनीन घलो आगे,फेर कमला के बुढ़ी सास अऊ ओकर सास ह आज ले गारी देयबर नी छोड़िन अउ न कमला ल बड़की बहू मानिन। कम पढ़े लिखे घलो नई हे कमला! अपन मईके के पहिली नोनी रहिस जौन दू कोस रोज साइकिल म आन गांव जाके 8वीं पास होय रहिस ।तहसील मा चपरासी बर नउकरी के चिट्ठी घलो आय रहिस,फेर दाई ददा मन मना कर दिस।अऊ लगती अठारा बच्छर मा परोसी…
Read Moreराजा के मुड़ी म सिंग
ऐ बात तब के आय.जब हमन छुट्टी बिताए बर गांव म जान, हमर कुंती दई अब्बड किस्सा कहनी कहे..संझा ढलत देरी नई की सब्बो लईकामन खटिया ल जोर के बइठ जाए, तहां ले कुतीं दइ के कहनी सुरु हो जाए…एक ठन राजा रहिस..हव कहत रहू त कहनी ल आगू कहहू.. नइ हूकारू भरहू त कहनी ल इहिच मेर खतम समझहू..त सब्बो झिन ह.. ह… हव..अइसे कहत रहन…त ओ राजा ल चम्पी मालिस के सौकिन रहे…आगू गुडी़ म एक झिन बदरू नांव के न उ सियान रहे..अब्बड तान दे ,देके चम्पी…
Read Moreलघुकथा : बड़का घर
जब मंगल ह बिलासपुर टेसन म रेल ले उतरिच तव रात के साढ़े दस बज गय रहिस। ओखर गाड़ी ह अढ़ाई घंटा लेट म पहुंचिस, जेखर कारन गाँव जवैया आखिरी बस जेहा साढ़े आठ छूटथे कब के छूट गे रहिस। ट्रेन ले उतर के वो हा सोचे लगिस के अब का करंव। फेर मंगल ह अपन पाकिट ले पर्स ल निकाल के देखिस, एक ठन पँचसौहा, दु ठन सौ रुपिया अउ दु ठन बिस्सी मने कुल सात सौ चालीस रुपिया वोमा रहिस। कातिक के महिना सुरु हो गय रहिस अउ…
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