- देवारी तिहार के गाड़ा-गाड़ा बधई
- सरगुजिहा गीत – गोई रे
- तोर मुसकी ढ़रत रूप
- तय जवान कहाबे
- 7 जुलाई तक
- दौना (कहिनी) : मंगत रविन्द्र
- पं. खेमेस्वर पुरी गोस्वामी के दस ठन कविता
- गीत : जिनगी के गाड़ा
- अब बिहाव कथे, लगा के देख
- जनता जनारदन
- छन्द के छ : एम.ए.छत्तीसगढी के पाठ्यक्रम मा जोडे जाना चाही
- कविता – चिड़िया रानी
- बांझ के पीरा-बांझ के सुख
- मंगत रविन्द्र के कहिनी ‘दुनो फारी घुनहा’
- ब्रत उपास : कमरछठ अउ सगरी पूजा
- भोंभरा : कबिता
- छत्तीसगढ़ी नाटक – मतदान बर सब्बो झन होवव जागरूक
- निराला साहित्य समिति, थान खम्हरिया के आयोजन
- राजा के मुड़ी म सिंग
- राखि तिहार
- जब ले बिहाव के लगन होगे
- छत्तीसगढ़ी गज़ल – हम परदेशी तान ददा
- आगू दुख सहिले
- सतनाम सार हे
- छन्द के छ : कुण्डलिया छन्द
- अनुवाद : तीसर सर्ग : सरद ऋतु
- छत्तीसगढ़ी गज़ल
- बसे हो माया मोरो नैन
- बंटवारा
- प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – मुहावरे
- धरसींवा के शिव मन्दिर
- छत्तीसगढ़ी गज़ल
- सोनहा सावन सम्मारी
- जाड़ के घाम
- बम बम भोले
- कोइली के गुरतुरबोली मैना के मीठी बोली जीवरा ल बान मारे रेे
- मैं जनम के बासी खावत हौं
- गणेश चतुर्थी पर कविता
- देखावा
- मेजाई के उपहार
- दादा मुन्ना दास समाज ल दिखाईस नावा रसदा
- वृत्तांत- (5) कौरा के छिनइ अउ जीव के बचई : भुवनदास कोशरिया
- गरीबा महाकाव्य (पंचवईया पांत : बंगाला पांत)
- मैं अक्खड़ देहाती अंव
- छत्तीसगढ़ी भूल भूलैया
- अक्षय तृतीया विशेष : पुतरी पुतरा के बिहाव
- संपादकीय : मोर डांड तो छोटे तभे होही संगी, जब आप बड़का डांड खींचहू
- नीम चघे करेला- ‘कड़ुवाहट संग हांसी’
- सोंच समझ के चुनव सियान
- मया के दीया
- चिरई चिरगुन बर पानी निकालव
- बइगा के चक्कर – नान्हे कहिनी
- छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह: धरती सबके महतारी -डॉ. बलदेव
- मोला करजा नई सुहावय
- जसगीत अउ छ्त्तीसगढ – दीपक शर्मा
- छत्तीसगढ़ी लोक कथा : जइतमाल के ठेंगा
- छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल
- भाव प्रवण सरस कृति : मनुख मोल के रखवारी
- चउतरा सेठ
- हिसार म गरमी
- 13 मई विश्व मातृ दिवस : महतारी महिमा (सरसी छंद)
- लमसेना – पुस्तक समीक्छा
- बहुरिया – कहिनी
- माटी के कुरिया
- पर्यटन : माण्डूक्य ऋषि के तपोभूमि ‘मदकू द्वीप’
- नेंगहा पंचन के नांव भुतावथे
- सुरता : प्रेमचंद अउ गांव
- जय ३६ गढ़ महतारी
- फेसबुक म अफिसर बनकेे मोटियारी ल फंसाइस, फेर धांध दीस
- छत्तीसगढ़ी नवगीत : पछतावत हन
- छत्तीसगढ़ी लोककथा : राजा के मया
- कहिनी : ममता
- सरग म गदर
- बित्ता भर भुइयां
- लाला फूलचंद श्रीवास्तव के कौशल प्रान्त ( छत्तीसगढ़ ) के बन्दना
- मंय छत्तीसगढ़ बोलथंव
- पितर पाख मा पुरखा मन के सुरता : हरि ठाकुर
- भक्ति-भाव के महापरब-सावन मास
- का होही?
- छत्तीसगढ़ी गजल
- छत्तीसगढ़ी गज़ल
- लघु कथा : पितर नेवता
- तुंहर मन म का हे
- हमर भाग मानी ये तोर जईसन हितवा हे
- रोवत हावय महतारी
- कबीर जयंती : जाति जुलाहा नाम कबीरा बनि बनि फिरै उदासी
- जिनगी के का भरोसा
- योग करव जी (कुकुभ छंद)
- कविता : मन के मोर अंगना म
- हाय रे मोर मंगरोहन कहिनी – डॉ. सत्यभामा आड़िल
- कविता : वा रे मनखे
- बरी-बिजौरी मा लुकाय बिग्यान
- मनोज कुमार श्रीवास्तव के गियारा कविता
- पुरखा के थाथी
- परकीति के पयलगी पखार लन
- मोर छत्तीसगढ़ कहां गंवागे
- कबिता : हाबे संसो मोला
- जाड़ हा जावत हे
- विष्णुपद छंद : हे जग के जननी
- अपन-अपन समझ
