नैन तै मिला ले

मोर संग नैना तै मिला ले गोरी मोर….. मोर संग नैना तै मिला ले ….. 2 छुटे न तोर मोर बंधना जनम के जोड़ी। अपन मया तै मोला देखा दे। मोर संग नैना तै मिला ले गोरी मोर…. मोर संग नैना तै मिलाले……. तोर मया ल मैं अपन बनाहू राजा मोर तोर मया ल मैं अपन बनाहू….. तोर नाव के मेहंदी अपन हाथ म लगाहुं। मया के भांवर मैं तोरे संग पराहुं। मोर संग नैना तै मिला ले गोरी मोर…. मोर संग नैना तै मिलाले……. जियत ले तोर संग जिनगी…

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सावन के परत हे फुहार

सावन के परत हे फुहार। रे संगी मोर आजा मोला झन बिसार। गरज चमक के बईरी बजुरी डरवावत हे। पानी के परत हे झिपार। रे संगी मोर आजा…. छानी के ओईरछा हा, टप टप चुहत हे। जइसे मोर आँसू के धार। रे संगी मोर आजा…. हरियर रूख राई मन, मोला बिजरावत हे। तुहंर बिना ठुंडगा जिनगी हमार। रे संगी मोर आजा… एसो के सावन मा आ जाबे जोंही मोर। नही ते बादर कस जिनगी अंधियार। रे संगी मोर आजा… सुरता आथे तोर चुहत रहिथे आँसू। काबर सुरता दिये हव बिसार।…

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सोलह सिनगार

सावन के महिना ल, सहराती महिला मन, बछर भर अगोरय। रंग रंग के पहिर ओढ़ के चटक मटक किंजरय। एक बछर, सावन म, महिला मन बर, नावा किसिम के परतियोगिता राखीस – जे महिला, सावन भर, सोलह सिनगार ले, सजे धजे रहि तेला, सावन के आखिरी दिन, भारी पुरूसकार देके सममानित करे जाही। सिनगार के नाव, कतको उमड़गे। तरी उप्पर गहना जेवर बनवा डरीन। नावा नावा फेसन के लुगरा लाद डरीन। सेंट के सीसी के खपत बाढगे। सावन के आखिरी म, बहुत बड़े जलसा राखे गीस, बिजेता ला, सममान समेत…

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नवा बिहान

हरियर-हरियर भुईया अउ चिड़िया-चिरगुन चहकत हे। नवा बिहान के सुग्घर-सुग्घर अंगना महकत हे। सोनहा कस हे माटी देख कइसन चमकत हे। संगी-संगवारी मन के संग म गुनत हे। लाली-लाली रंग म सुरुज दमकत हे। बगरा के उजियारा अंगना म पसरत हे। नदिया नरवा ह कईसन सुग्घर बोहावत हे। भुईया के अंगल अपन रंग म रंगत हे। सुरूर-सुरूर कहिके बैरी पवन ह चलत हे। महका के माटी ल मोर तन ल छुवत हे। अनिल ‘रामकुमारी’ पाली तारबाहर बिलासपुर। आई टी आई मगरलोड धमतरी 7722906664

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हमर घरे मा हावय दवई

मेंथी दाना पीस के राखव, एक चम्मच पानी मा चुरोवव। रोजे दिन येला पियव,रोग बिमारी ला धुरोवव। नून शक्कर कुछु झन डारव, सोझे येला पीबो। आंव, शुगर, माडी पीरा मिटाही, सुख के जिनगी जीबो। पेट बिकारी रहिही तेमा, मीठ्ठ छाछ, दही पानी ला पीबो। पेट दरद अनपचक नइ होही, बने जनगी जीबो। रोजे दिन जउन अांवरा खाही, बांचे रहिही बिमारी ले। दिल के बिमारी कभू नइ होही, बांचही बी.पी.के चिन्हारी ले। जेवन खाय के पाछू हांथ के पानी झन पोछव. दूनोंं हथेरी ला रगर के, आंखी कान के उपर धरव।…

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बादर गरजत हे

[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] सावन भादो के झड़ी में, बादर ह गरजत हे । चमकत हे बिजली, रहि रहि के बरसत हे । डबरा डबरी भरे हाबे , तरिया ह छलकत हे । बड़ पूरा हे नदियाँ ह जी , डोंगा ह मलकत हे । चारों कोती खेत खार , हरियर हरियर दिखत हे। लहलहावत हे धान पान, खातू माटी छींचत हे । सब के मन झूमत हाबे, कोयली गाना गावत हे। आवत हाबे राखी तिहार, भाई ल सोरियावत हे। घेरी बेरी बहिनी मन , सुरता ल…

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सावन समागे रे

[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] धरती आज हरियागे रे। सावन सुग्घर समागे रे।। मोर मयारू के मया म, मन के पिरीत पिऊँरागे रे।। सावन सुग्घर समागे रे………. बादर गरजे, बरसा बरसे, बिन जोंही के हिरदे तरसे। अँखिया ले आँसू बोहागे रे। सावन सुग्घर समागे रे।।१ गिरत हे पानी,चुहत हे छानी, कहाँ लुकाय हे मोर ‘मनरानी’। आस के अँगना धोवागे रे। सावन सुग्घर समागे रे।।२ ऊँघाय तन अउ जागय मन, चेहरा तोर,हिरदे के दरपन। असाङ कस तैं लुहादे रे। सावन सुग्घर समागे रे।।३ चुरपुर ठोली,गुरतुर बोली, जुच्छा परे हे…

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प्रेमचंद के काहनी अऊ छत्तीसगढ़

[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] प्रेमचंद ल छत्तीसगढ़ के लईका सियान सबो जानथे उखर काहनी इस्कूल अऊ कालेज म पढ़ाय जाथे, प्रेमचंद ल हिन्दी काहनी के सम्राट कहे जाथे काबर कि वो हा 300 ले आगर काहनी लिखे हावय, ओला उपन्यास सम्राट घलाव कहिथे। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि, गोदान, गबन, कफन, अईसने अड़बड़ अकन उपन्यास लिखे हावय। उही किसम ले बूढ़ीकाकी, ईदगाह, पूस की रात, नशा, गुल्ली डंडा, नमक का दरोगा, आत्माराम, गृहदाह, जूलुस, भाड़े का टट्टू, सत्याग्रह, सवा सेर गेहूं प्रेरणा, बाबा जी भोग, पशु से मनुष्य,…

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छन्न पकैया : पकैया छ्न्द

छन्न पकैया छन्न पकैया,पक्का हम अपनाबो नइ लेवन अब चीनी राख़ी,देशी राखी लाबो। छन्न पकैया छन्न पकैया,बहिनी आँसों आबे। हमर देश के रेशम डोरी,सुग्घर तैं पहिराबे। छन्न पकैया छन्न पकैया,चीनी झालर टारव झन लेवव जी उँकर माल ला,माटी दीया बारव। छन्न पकैया छन्न पकैया,झगरा चीन ल प्यारा हिन्दी चीनी भाई भाई,झूठा हावय नारा। छन्न पकैया छन्न पकैया,चीनी कपड़ा छोड़व। पहिनव सुग्घर सूती कपड़ा,गरब चीन के टोरव। अजय अमृतांशु भाटापारा

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समे समे के गोठ ये

[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”] सांच ल आंच काय हे जेन मेर गलत दिखते तेला बोले बर पड़ही, जेन ह हमर छतीसगढ़ के माटी के अपमान करही, जेन ह ईहाँ के मया ल लात मारही अऊ जेन मनखे ह ईहा के जर जमीन जंगल के सत्यानाश करे बर उमड़े हे तेने ह हमर बईरी ये। वोहा कभू हमर हितवा नई हो सकय, फेर सोचथव आज के समे म सब अपनेच सुवारथ में डूबे हाबय, कमे देखे अऊ सुने बर मिलथे छतीसगढ़ भुईयां के पीरा ल समझईया । अभिच…

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