- मोर लइका पास होगे
- ग़ज़ल : सुकवि बुधराम यादव
- अकती बिहाव
- श्रीयुत् लाला जगदलपुरी जी के छत्तीसगढ़ी गजल – धन-पसु
- मैं वसुधा अंव
- बैसाखु के गांधी मिलगे
- कहिनी : चटकन
- गरमी आगे
- छत्तीसगढ़ी भाषा का मानकीकरण : कुछ विचार
- खिल खिलाके तोर मुस्काई
- मेकराजाला म चार बरिस के गुरतुर गोठ : दू आखर
- जड़कला मा करव योग रहव निरोग
- इही त आये गा छ्त्तीसगढ सरकार
- कैसे करन तोर बापू बडा़ई : दाऊ निरंजनलाल गुप्ता के गीत
- जानबा : दादूलाल जोशी ‘फरहद’
- पीरा ल कइसे बतावंव
- सेठ घर के नेवता : कहिनी
- पीतर पाख
- माँ-छत्तीसगढ़ के महत्व
- नान्हे कहिनी – ढुलबेंदरा
- ढोंगी बाबा
- काँदा कस उसनात हे
- माटी के मया सियान मन के सीख
- बंदौ भारत माता तुमला : कांग्रेस आल्हा
- हमन कहां जात हन – सुधा वर्मा
- छत्तीसगढ़ी साहित्य में काव्य शिल्प-छंद
- कहानी संग्रह : भोलापुर के कहानी – संपादकीय
- कबिता : चोरी ऊपर ले सीना जोरी
- सुकारो दाई
- आमा के चटनी
- सोनाखान के आगी – लक्ष्मण मस्तुरिया
- परेवा गीत: बाबूलाल सिरीया दुर्लभ
- बियंग ( संदर्भ – घेरी बेरी होवत किसान मन के मौत ) : बिसेला कोन
- मोर गांव कहां गंवागे
- तिल लाड़ू खाबोन – मकर संक्रांति मनाबोन
- मन के लाड़ू
- चांटी मन के कविता
- लॉकडाउन म का करत हें असम के छत्तीसगढ़ वंशी
- भुईया दाई करत हे गोहार
- फील्ड सॉंग्स ऑफ छत्त्तीसगढ़
- कुकुर कटायन
- आकाशवाणी ले ’रमन के गोठ’ के प्रसारण
- नदिया के पीरा
- नौ हाथ लुगरा पहिरे तभो ले देंहे उघरा
- चुनाव आयोग म भगवान
- सुकमा म एएनएम(आरबीएसके) अभ्यर्थि मन के काउंसलिंग 10 मार्च को
- दू आखर
- किसान मन के अन्नदान परब छेरछेरा पुन्नी
- वृत्तांत- (7) अपन धरती अपन आगाश : भुवनदास कोशरिया
- अभिनय के भूख कभी मिटय नइ: हेमलाल
- बुधारू के जीवन
- 31 मार्च सुरता : शांति दाई
- हीरा गंवा गेहे बनकचरा म…
- प्रयोजनमूलक छत्तीसगढ़ी की शब्दावली – गीत, नृत्य
- आठे कन्हैया – 36 गढ़ मा सिरि किसन के लोक स्वरूप
- गियान के जोत
- दाई ददा भगवान हे
- जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका लोकभाषा विशेषांक : छत्तीसगढ़ी
- राज्य स्तरीय छंदमय कवि गोष्ठी संपन्न
- अनुवाद : आशा के किरण (The Silver Lining)
- सरग सुख : कहिनी
- छत्तीसगढ़ी गज़ल – कागज म कुआं खनात तो हे
- गॉंव कहॉं सोरियावत हे : घंघरा -घुघरू, घुम्मिर-घांटी
- सोसन अउ कानून (कबिता ) : सुशील भोले
- ऊँचई
- कहानी : अंधविसवास
- छेरछेरा के तिहार – लइका मन पारत गोहार
- नीम चघे करेला- ‘कड़ुवाहट संग हांसी’
- बरसा के बादर आ रे
- कहिनी : चलनी में दूध दुहे, अउ करम ला दोस दे
- कोइली के गुरतुरबोली मैना के मीठी बोली जीवरा ल बान मारे रेे
- आज जरूरत हे सत के
- दर्रा हनागे
- गोठ बात : पानी बचावव तिहार मनावव
- गाँव रहिस सुग्घर, अब शहर होगे
- बिसवास अउ आसथा के केन्द्र – दाई भवानी , विन्दवासिनी अउ बाबा बन्छोरदेव
- छत्तीसगढ़ी कहानी : सजा
- टेकहाराजा : छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य के नवा अंजोर
- मया के मुकुर
- अश्लीलता के सामूहिक विरोध जरूरी हे
- देख कइसे फागुन बउरात आत हे
- कामवाली चमेली के पीरा
- बरसा के बादर आ रे : कबिता
- फुगडी गीत
- छत्तीसगढ़ भासा के असली सवाल सोझ-सोझ बात
- जमुना के तीर तीर हो
- सोंच समझ के चुनव सियान
- विष्णु सखाराम खांडेकर कहानी के एकांकी रूपांन्तरण : सांति
- छ्न्द बिरवा : नवा रचनाकार मन बर संजीवनी बूटी
- छत्तीसगढ़ गौरव के रचियता पंडित शुकलाल पांडेय
- नाटक अऊ डॉ. खूबचंद बघेल
- गीत : रामेश्वर शर्मा
- परोसी के भरोसा लइका उपजारना
- परंपरा – अंगेठा आगी
- विश्व जल संरक्षण दिवस : सार छंद मा गीत – पानी जग जिनगानी
- चँदेनी के माँग में फागुन: पुरुषोत्तम अनासक्त
- अग्यातवास
- दमांद बाबू : कबिता
