लाल कुकुर ह बर पेड़ के छांव में बइठे राहे।ओतके बेरा एक ठन करिया कुकुर ह लुडुंग – लाडंग पुछी ल हलावत आवत रिहिस। ओला देख के लाल कुकुर ह आवाज दिस। ऐ कालू कहां जाथस ? आ थोकिन बइठ ले ताहन जाबे। ओकर आवाज ल सुन के कालू ह तीर में आइस अऊ कहिथे — काये यार लालू काबर बलाथस। लालू ह कहिथे – आ थोकिन बइठ ले कहिथों यार। कहां लकर – धकर जात हस। कोनो पारटी – वारटी हे का ? कालू ह कहिथे – कहां के…
Read MoreYear: 2019
मोरो बिहा कर दे
गाँव में सरपंच घर ओकर बड़े लईका के बिहाव में तेल हरदी चढ़त रहीस हे, सगा सोदर सब आय घर अंगना गदबदावत रिहीस फेर ओकर छोटे बाबू श्यामू ह दिमाग के थोरकिन कमजोरहा रिहीस पच्चीस साल के होगे रिहीस तभो ले नानकुन लईका मन असन जिद करत रिहीस I ओहा बिहाव के मायने का होते उहूँ नीं जानत रिहीस, तभो ले अपन बड़े भैय्या ल देखके ओकरे असन मोरो बिहा करव कईके अपन दाई ल काहत रहय I सहीच में मंद बुद्धि के मनखे ले देखबे अउ ओकर गोठ ल…
Read Moreनानकिन किस्सा : प्याऊ
गाँव के गरीब किसान के लइका सुजल बी ए के परीक्षा ला प्रथम श्रेणी ले पास कर डारिस। गाँव के गुरुजी हा ओला यूपीएससी के परीक्षा देवाय के सुझाव देइस। परीक्षा के फारम भरेबर ओला बड़े शहर मा जायबर परिस। सुजल बिहनिया ले सायकिल मा सड़क तीर के गाँव आइस अउ साइकिल ला उहींचे छोड़ बस मा बइठ के शहर आ गे। फारम लेवत, भरके डाकघर मा जमा करावत ओला अड़बड़ बेरा होगे।मंझनिया के अढ़ई बजगे रहय। ओला घर घलावलहुटना रहिस।फारम भरे के सुध मा पानी तक पीये के समय…
Read Moreआमा खाव मजा पाव
गरमी के मौसम आते साठ सब झन ला आमा के सुरता आथे।लइका मन ह सरी मंझनिया आमा टोरे ला जाथे , अऊ घर में आ के नून – मिरचा संग खाथे।लइका मन ला आमा चोरा के खाय बर बहुत मजा आथे।मंझनिया होथे तहान आमा बगीचा मा आमा चोराय ला जाथे। आमा एक प्रकार के रसीला फल होथे।ऐला भारत में फल के राजा बोले जाथे।आमा ला अंग्रेजी में मैंगो कहिथे एकर वैज्ञानिक नाम – मेंगीफेरा हे। आमा के किसम – आमा भी कई किसम के होथे अउ सबके सुवाद अलग अलग…
Read Moreआमा के चटनी
आमा के चटनी ह अब्बड़ मिठाथे, दू कंऊरा भात ह जादा खवाथे । काँचा काँचा आमा ल लोढहा म कुचरथे, लसुन धनिया डार के मिरचा ल बुरकथे। चटनी ल देख के लार ह चुचवाथे, आमा के चटनी ह अब्बड़ मिठाथे । बोरे बासी संग में चाट चाट के खाथे, बासी ल खा के हिरदय ह जुड़ाथे , खाथे जे बासी चटनी अब्बड़ मजा पाथे , आमा के चटनी ह अब्बड़ मिठाथे । बगीचा में फरे हे लट लट ले आमा , टूरा मन देखत हे धरों कामा कामा । छुप…
Read Moreछत्तीसगढ़ी भाषा का मानकीकरण : कुछ विचार
डॉ. विनय कुमार पाठक और डॉ. विनोद कुमार वर्मा की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण’ पढ़ने को मिली। इसमें देवनागरी लिपि के समस्त वर्णों को शामिल करने की पुरजोर वकालत की गई है। यह भी ज्ञात हुआ कि डॉ. वर्मा और श्री नरेन्द्र कौशिक ‘अमसेनवी’ की पुस्तक ‘ छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण : मार्गदर्शिका’ भी शीघ्र प्रकाशित होने वाली है। यहाँ मैं ‘छत्तीसगढ़ी का संपूर्ण व्याकरण’ पुस्तक पर अपने कुछ सवाल और विचार रखना चाहता हूँ। क्या व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए ही देवनागरी लिपि के सभी वर्णों को स्वीकार किया गया…
Read Moreअक्ती तिहार
छत्तीसगढ़ म हर तिहार ल हमन सुघ्घर रूप ले मनाथन। तिहार ह हमर घर, परिवार, समाज अउ संसकिरिती म रचे-बसे हावय जेखर कारन येखर हमर जीनगी म अब्बडेच़ महत्तम हे। तिहार ह हमर खुसी उत्साह के परतीक हावय जेला हमन सबो झन जुर-मिर के मनाथन। तिहार से हमन ल एक नवा उरजा मिलथे जेखर ले हमन अपन जीनगी म आने वाला कई परकार के बिघन-बाधा ल पार करके आघु बढ़े के सक्ती पाथन। पर आज के आघुनिकता के अंधा दउड़ म हमन अपन तीज-तिहार परिवारदार संगी-जवरिहां के संग मिल के…
Read Moreमजदूर
जांगर टोर मेहनत करथे, माथ पसीना ओगराथे । मेहनत ले जे डरे नहीं, उही मजदूर कहाथे । बड़े बिहनिया सुत उठके, बासी धर के जाथे । दिन भर बुता काम करके, संझा बेरा घर आथे । बड़े बड़े वो महल अटारी, दूसर बर बनाथे । खुद के घर टूटे फूटे हे , झोपड़ी मा समय बिताथे । रात दिन जब एक करथे, तब रोजी वो पाथे । मेहनत ले जा डरे नहीं, उही मजदूर कहाथे । पानी बरसा घाम पियास, बारो महीना कमाथे । धरती दाई के सेवा करके, सुघ्घर…
Read Moreपुण्य सकेले के दिन आय अक्ती
हमर देस मा तिहार मनाय के परंपरा आदिकाल से चले आवत हे। भगवान ले मनौती करेबर, अशीस पायबर अउ मनौती पूरा होय के धन्यवाद देयबर तिहार मनाय जाथे। अइसने एक समिलहा तिहार बइसाख महिना के तीज के दिन मनाय जाथे जौन ला अक्ती तिहार कहे जाथे। अक्ती तिहार के छत्तीसगढ़ मा घलाव अबड़ मानता हे। घर परिवार,खेती किसानी, बर बिहाव आदि बर ए दिन ला बहुतेच शुभ मानथे। नउकर अउ मालिक के बीच गठजोड़ होय के तिहार आवय। अक्ती ला अक्षय तृतीया के नाम से जाने जाथे।जेकर मतलब होथे जौन…
Read Moreपुतरी पुतरा के बिहाव
पुतरी पुतरा के बिहाव होवत हे, आशीष दे बर आहू जी। भेजत हाँवव नेवता सब ला, लाड़ू खा के जाहू जी।। छाये हावय मड़वा डारा, बाजा अब्बड़ बाजत हे। छोटे बड़े सबो लइका मन, कूद कूद के नाचत हे।। तँहू मन हा आके सुघ्घर, भड़ौनी गीत ल गाहू जी। भेजत हावँव नेवता सब ला, लाड़ू खा के जाहू जी।। तेल हरदी हा चढ़त हावय, मँऊर घलो सौंपावत हे। बरा सोंहारी पपची लाड़ू, सेव बूंदी बनावत हे।। बइठे हावय पंगत में सब, माई पिल्ला सब आहू जी। भेजत हावँव नेवता सब…
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