हिन्दू धर्म में बहुत अकन तिहार मनाये जाथे । ये तिहार हा मनखे मे नवा जोश अउ उमंग पैदा करथे । आदमी तो रोज काम बुता करत रहिथे फेर काम ह कभू नइ सिराय । येकर सेती हमर पूर्वज मन ह कुछ विशेष तिथि ल तिहार के रुप में मनाय के संदेश दे हे । वइसने एक तिहार अक्छय तृतीया के भी मनाय जाथे । छत्तीसगढ़ में अकती या अक्छय तृतीया तिहार के बहुत महत्व हे । ये दिन ल बहुत ही शुभ दिन माने गेहे। ये दिन कोई भी…
Read MoreYear: 2019
अकती बिहाव
मड़वा गड़ाबो अँगना मा, सुग्घर छाबो हरियर डारा। नेवता देबो बिहाव के, गाँव सहर आरा पारा।। सुग्घर लगन हावे अकती के, चलो चुलमाटी जाबो। शीतला दाई के अँगना ले, सुग्घर चुलमाटी लाबो।। सात तेल चघाके सुग्घर, मायन माँदी खवाबो। सुग्घर सजाबो दूल्हा राजा, बाजा सँग बराती जाबो।। कोनो नाचही बनके अप्सरा, कोनो घोड़ा नचाही। सुग्घर बजाके मोहरी बाजा, सुग्घर बराती परघाही।। पंडित करही मंत्र उच्चारण, मंगल बिहाव रचाही। सात बचन ला निभाहू कहिके, सातो वचन सुनाही।। धरम टिकावन होही सुग्घर, पियँर चउँर रंगाय। दाई टिकत हे अचहर-पचहर, ददा टिके धेनू…
Read Moreनंदावत हे अकती तिहार
अकती तिहार हमर छत्तीसगढ़ अँचल के बहुँत बढ़िया प्रसिद्ध परंपरा आय। ये तिहार ला छत्तीसगढ़ के गाँव-गाँव मे बड़ा हर्सोल्लास के संग मनाय जाथे। बैशाख महीना के अँजोरी पाख के तीसरा दिन मा मनाय जाथे।आज के जुग मा नवा-नवा मनखे अउ नवा-नवा जमाना के आय ले अउ हमर जुन्ना सियान मन के नंदाय ले हमर अतेक सुग्घर तिहार हा घलो नंदावत हे। पहेली के सियान मन अकती तिहार के पहेली ले जोरा करत राहय।अकती तिहार आही ता गाँव के डिही डोंगर ठाकुर दिया में अउ शीतला दाई में दोना में…
Read Moreकलिंदर
बारी में फरे हाबे सुघ्घर, लाल लाल कलिन्दर। बबा ह रखवारी करत, खात हावय जी बंदर।। लाल लाल दिखत हे, अब्बड़ मीठ हाबे। बाजार मे जाबे त, बीसा के तेहा लाबे।। एक चानी खाबे त, अब्बड़ खान भाथे। नइ खावँव कहिबे त, मन हा ललचाथे।। चानी चानी खाबे त, सुघ्घर मन ह लागथे। सोनू मोनू जादा खाथे, बारी डाहर भागथे।। प्रिया देवांगन “प्रियू” पंडरिया जिला – कबीरधाम (छत्तीसगढ़) [email protected]
Read Moreछत्तीसगढ़ी संस्कृति म गोदना
छत्तीसगढ़ी लोकाचार परंपरा म गोदना के अब्बड़ महत्म हे, येला छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी संस्कृति सामाजिक-आर्थिक, धार्मिक सब्बो म बढ़ ख्याति मिले हे, अउ ये पीरा देवइया परंपरा ल सब्बो छत्तीसगढ़िया आदिवासी मनखे मन आजो बड़ खुशी अउ जिम्मेदारी ले निभात आत हे, काबर की गोदना गोदवाना कोनो आसान बात नोहे, गोदना गोदाये के सौउख कराईया मनखे मन ल अब्बड़ पीरा सहेन करे ल लागथे। काबर के गोदना ल गोदे बर देवारिन दाई मन सूजी ल कोचक के मास म होब के गोदना ल गोदथे, जेकर से मनखे के मरत तक…
Read Moreकरसी के ठण्डा पानी
गरमी के मउसम अउ सुरूज नरायन अंगरा बरोबर तिपत हे। गरमी बरसात अउ ठण्डा के मउसम एक के पाछु एक आथे एहा जुग जुग ले चलत हे। फेर आजकल के मउसम बदले के समय हा घलो परिवरतन हो गे हे। आधुनिकता, उदयोग अउ बाढ़त परदूसन ले मउसम म घलो बदलाव होवत जावत हे। ऐ बदलाव के करइया हम मनखे मन आन। हमर राज म घलो तीनों ठन मउसम के अब्बड़ महत्व हे। बरसात फेर ठण्डा अउ ठण्डा के पाछु गरमी के मउसम आथे। ठण्डा तक तो नदी नरवा अउ कुवां…
Read Moreमैगी के जमाना
जब ले आहे मैगी संगी, कुछु नइ सुहावत हे। भात बासी ला छोड़ के, मैगी ला सब खावत हे।। दू मिनट की मैगी कहिके, उही ला बनावत हे। माई पिल्ला सबो झन, मिल बाँट के खावत हे।। सब लइका ला प्यारा हावय, एकरे गुन ल गावत हे । स्कूल हो चाहे पिकनिक हो, मैगी धर के जावत हे।। लइका हो चाहे सियान, सबला मैगी सुहावत हे । कोनो कोती जावत हे, पहिली मैगी बनावत हे।। कोनो आलू प्याज डार के, त कोनो सुक्खा बनावत हे। कोनो सूप बनावत त, कोनो…
Read Moreबीता भर पेट
तुम बइठे हव मजा उड़ावत, गूगल इंटरनेट के। हम किंजरत हन बेवस्था मा, ए बीता भर पेट के। साक्षात्कार बुलाथव जाथे, बेटा हा हर साल के। खाली जेब कहाँ उत्तर दय, साहब तुँहर सवाल के। यू मे गो कहि देथव सँउहे, पाछू मुँह मुरकेट के। हम किंजरत हन बेवस्था मा, ए बीता भर पेट के। रोजगार के अवसर आथे, मरीचिका के भेस मा। बेटा भूखन लाँघन उखरा, शामिल होथे रेस मा। फड्डल नाँव लिखाथे ऊपर,हमर नाँव ला मेट के। हम किंजरत हन बेवस्था मा,ए बीता भर पेट के। समाचार टी.वी.पेपर…
Read Moreमाथा के पसीना
रुकना नही हे थमना नही हे पांव के भोमरा ल देखना नही है मन्ज़िल अगोरत हे रस्ता तोर सुरताना नही हे,घबराना नही है धीरे धीरे चल के कछुवा खरहा ल हरवाइस हे, सोवत रहिगे केछुवा बपुरा अड़बड़ पछताइस हे।। अभी मिलिस असफलता तोला हिम्मत से तै काम कर। उदम कर कमर कस के मत बैठ तैं हार कर।। तोला अगोरे उजियारी बिहिनिया मेहनत के बून्द गंवा ले, कल होही जगमग रथिया तोर जिनगी ल सँवार ले।। ठान ले छत्तीसगढ़ के मनखे मन ले कभू मत हारो जी बून्द बून्द ले…
Read Moreबियंग: ये दुनिया की रस्म है, इसे मुहब्बत न समझ लेना
मेंहा सोंचव के तुलसीदास घला बिचित्र मनखे आय। उटपुटांग, “ भय बिनु होई न प्रीति “, लिख के निकलगे। कन्हो काकरो ले, डर्रा के, परेम करही गा तेमा …… ? लिखने वाला लिख दिस अऊ अमर घला होगे। मेहा बिसलेसन म लग गेंव। सुसइटी म चऊंर बर, लइन लगे रहय। पछीना ले तरबतर मनखे मन, गरमी के मारे, तहल बितल होवत रहय। सुसइटी के सेल्समेन, खाये के बेरा होगे कहिके, सटर ला गिरावत रहय, तइसने म खक्खू भइया पहुंचगे। गिरत सटर अपने अपन उठगे, खक्खू भइया के चऊंर तऊलागे, पइसा…
Read More