- विकास के कीमत तो चुकाय ल परही
- बाल कहिनी : अइसे धरिन चोर गोहड़ी
- बियंग: परगति
- सोनाखान के शान: वीर नारायण महान
- कविता – सब चीज नंदावत हे
- कविता : नवां अंजोर अउ जाड़
- मुर्रा के लाड़ू : नान्हे कहिनी
- पोल खोल
- कहानी : बड़का तिहार
- अभी के समें अउ साहितकार
- कहिनी : डोकरा डोकरी : शिवशंकर शुक्ल
- गांव के सीतला
- इतवार तिहार
- मांघी पुन्नी के मेला
- जांजगीर-चांपा : ग्रामीण बेरोजगार मन ल डेयरी काम मं मिलही छह दिन के निःशुल्क आवासीय प्रशिक्षण
- घटारानी हावे तोर नांव
- गरीबा : महाकाव्य (नउवां पांत : गंहुवारी पांत) – नूतन प्रसाद शर्मा
- डॉ. संजय दानी के छत्तीसगढ़ी गजल
- कामकाजी छत्तीसगढ़ी मोर बिचार
- गांव गंवई के चुनई
- नान्हे कहिनी : डोकरा-डोकरी के झगरा
- कविता संग्रह : रउनिया जड़काला के
- फिलिम समीच्छा : गुँरावट छत्तीसगढ़ीया मन के हिरदे म खुसरही
- माँ-छत्तीसगढ़ के महत्व
- माटी के दीया जलावव : सुघ्घर देवारी मनावव
- मंगल कामना के दिन आय अक्ती
- लोक कथा : लेड़गा मंडल
- चलती के नाम गाड़ी, बिगड़ गे त…
- मोर गांव मया-प्रेम के
- बाबा गुरु घासीदास के सब्बे मनखे ल एक करे के रहिस हे विचार मनखे मनखे एक समान
- छत्तीसगढ़ी संस्कृति म गोदना
- मोर छत्तीसगढ़ के माटी
- छब्बीस जनवरी मनाबो : वंदे मातरम गाबोन
- सरग म गदर
- गुरतुर गोठ (गीत) सुकवि बुधराम यादव
- नान्हे कहिनी : दुकालू
- लोक कथा : कोपरी के महल
- भाखा के महमहई बगरावत छत्तीसगढ़ी पत्रिका : बरछाबारी
- तीजा
- छेरछेरा
- गुरतुर बोली बोलव
- नउकरी लीलत हमर तीजतिहार
- सइताहा – कहिनी
- बोधन राम निषाद राज के तीन छत्तीसगढ़ी गीत
- बित्ता भर भुइयां
- कका के घर : छत्तीसगढ़ी उपन्यास
- अपन-अपन समझ
- गीत : जिनगी के गाड़ा
- मोर गॉंव कहॉं सोरियावत हे : महंगा जमो बेचावत हें
- गनेसी के टुरी
- सावन के बरखा
- कहाँ गंवा गे सिरतोन के मनखे
- रंग: तीरथराम गढ़ेवाल के कविता
- पं. खेमेस्वर पुरी गोस्वामी के दस ठन कविता
- ग़ज़ल छत्तीसगढ़ी
- भइंसा चोरी के सीबीआई जांच
- विष्णुपद: छंद – मोखारी
- अकती तिहार
- गुने के गोठ : मोर पेड़ मोर पहिचान
- गीत
- मदरस कस मीठ मोर गांव के बोली
- मनखे गंवागे
- बसंत पंचमी एक मनभावन परब
- कुछ तो बनव
- सिक्छा ऊपर भारी पड़े हे अंधबिस्वास
- चित्रगुप्त के इस्तीफा
- आँखी मा आँखी
- गुंडाधूर
- सुरता (संस्मरण) – सिकरनिन दाई
- चैत-नवरात म छत्तीसगढ़ी दोहा 3 : अरुण कुमार निगम
- चिरई चिरगुन बर पानी निकालव
- देखो फुलगे, चंदइनी गोंदा फुलगे
- चल ना रे कांवरिया
- गउ हतिया
- चेरिया का रानी बन जाहय
- छत्तिसगढ़ के गंगा : हरि ठाकुर के गीत
- कुशलाई दाई के मंदिर म सजे हे जेवारा.
- पंचायती राज के पंदरा अगस्त
- अग्यातवास
- संस्कृति बिन अधूरा हे भाखा के रद्दा
- छत्तीसगढ़ मं बिहाव के रीति-रिवाज
- चैत-नवरात म छत्तीसगढ़ी दोहा 4 : अरुण कुमार निगम
- नारी सक्ती जगाना हे – दारु भटठी बंद कराना हे
- सियान मन के सीख- चुप बरोबर सुख नहीं
- लालच के फल
- नवगीत : गाँव हवे
- राखी के आगे तिहार
- असम में जीवंत छत्तीसगढ़
- कमरछठ कहानी (3) – मालगुजार के पुण्य
- हीरा गंवा गेहे बनकचरा म…
- अनुवाद : बारह आने
- लघुकथा – आटोवाला
- नवा थियेटर के वरिष्ठ कलाकार अऊ रिंगनी-रवेली नाच पार्टी के जोक्कर उदय राम श्रीवास
- छेरछेरा : समाजिक समरसता के तिहार
- भुलवारे बर तब अंजोर के गजब गीत गाथे : डॉ. परदेशीराम वर्मा के गीत
- शिक्षक दिवस 5 सितम्बर : सिक्छक हँव सरलग सिखथँव
- छत्तीासगढ़ी म परथंम धर्म उपदेशक संत गुरू घासीदास
- नंदाजाही का रे कमरा अउ खुमरी
- सुंदरी बन गे भंइसी मेंछरावत हे, संसो म ठेठवार के परान सुखावत हे
- पद्मश्री डॉ.सुरेन्द्र दुबे के वेबसाईट
