- मंय छत्तीसगढ़ बोलथंव
- पीथमपुर के कलेसरनाथ : भोला बबा के महत्तम
- रेमटा टुरा – २ चिपरिन के मही
- बिन बरसे झन जाबे बादर
- लगथे आजेच उन आहीं : श्यामलाल चतुर्वेदी के कविता
- मोरो बिहा कर दे
- चांटी मन के कविता
- मया के गीत
- छत्तीसगढ़ी गज़ल – हमरे गाल अउ हमरे चटकन
- गनेसी के टुरी
- जाड़ के घाम
- धीर लगहा तैं चल रे जिनगी
- ढोंगी बाबा
- सरगुजिहा व्यंग्य कबिता: लचारी
- श्रीयुत् लाला जगदलपुरी जी के छत्तीसगढ़ी गजल – का कहिबे?
- जतन बर करन दीपदान
- मँहगाई
- भोलापुर के कहानी : कहानी संग्रह
- भारतीय संविधान अउ महतारी भाखा
- चरभंठिया को गोठ
- गति-मुक्ति : छत्तीसगढी कहिनी संग्रह
- जागो हिन्दुस्तान
- पद्मश्री डॉ॰ मुकुटधर पाण्डेय के कविता
- कल 2 अक्टूबर अहिंसा के पुजारी के पुण्यस्मरण के साथ ‘गुरतुर गोठ’ का प्रवेशांक
- बइगा के चक्कर – नान्हे कहिनी
- समे समे के गोठ ये
- अहिमन कैना : छत्तीसगढी लोक गाथा
- हमर छत्तीसगढ़
- सरगुजिहा बोली कर गोठ
- मोर गाँव के बिहाव
- भाव प्रवण सरस कृति : मनुख मोल के रखवारी
- नारी हे जग में महान
- नेताजी ल भकाड़ूराम के चिट्ठी
- ललित नागेश के गज़ल
- सुमिरव तोर जवानी ल
- छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के तीन दिवसीय छठवां प्रांतीय सम्मेलन सम्पन्न
- पुस्तक समीक्छा : धनबहार के छांव म
- गोठ बात अउ चिन्हारी सम्मान के आयोजन भिलाई म.
- देव म महादेव भकूर्रा महादेव
- दूसर हो जाथे
- छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल : सत्ता धारी
- छत्तीसगढ़ी गज़ल
- येदे पटवारी ला फेर मार परे हे काबर कि रावन नई जरे हे
- 8 बछर के पाछू सुरता आईस टाटपट्टी घोटाला
- दोहालरी नवा बछर के
- छत्तीसगढ़ी जनउला (पहेली-प्रहेलिकायें)
- सरग सुख : कहिनी
- लोग लइका बर उपास – कमरछट के तिहार
- सबद के धार : पीरा ल कईसे बतावंव संगी
- चैत-नवरात म छत्तीसगढ़ी दोहा 1 : अरुण कुमार निगम
- मानसून
- होरी हे रिंगी चिंगी : रंग मया के डारव संगी
- रघुबीर अग्रवाल पथिक के छत्तीसगढ़ी मुक्तक : चरगोड़िया
- शिवशंकर के सावन सम्मार
- दैनिक देशबंधु के संदर्भ में छत्तीसगढ़ी की साहित्यिक पत्रकारिता का विश्लेष्णात्मक अध्ययन
- महाकवि कपिलनाथ कश्यप के ‘रामकथा’ के कुछ अंस
- दारू छोड़व
- तुंहर मन म का हे
- तीजा जावत
- सज्जन के संग : कोदूराम दलित के कुण्डलियॉं
- पंडवानी के सुर चिरैया-तीजन बाई
- लोक कथा : लेड़गा के कड़ही
- पहुँचगिस संसद
- कविता संग्रह : रउनिया जड़काला के
- नान्हे कहिनी – ढुलबेंदरा
- लींग परीक्छन के परिनाम
- सुरता सुशील यदु
- मोर डांड तो छोटे तभे होही संगी, जब आप बड़का डांड खींचहू
- एम्स, रायपुर में केशियर, असिस्टेंट इंजीनियर और अन्य वेकेंसी अंमित तिथि 27 मार्च
- हमन कहां जात हन – सुधा वर्मा
- माथा के पसीना
- छत्तीसगढ़ी गज़ल
- कहिनी: तारनहार
- बुढ़वा लइका पांव पखारत हे तोर
- जसगीत अउ छ्त्तीसगढ – दीपक शर्मा
- वृत्तांत- (7) अपन धरती अपन आगाश : भुवनदास कोशरिया
- कवित्त छंद
- धान बेचई के करलई
- योग करव जी (कुकुभ छंद)
- तोर मुसकी ढ़रत रूप
- भंवरा तोर मन के नोहे: बद्री विशाल परमानंद
- व्यंग्य : सरकारी तिहार
- छत्तीसगढ़ी नवगीत
- दाई अउ बबा के वेलेन्टाइन डे – कहिनी
- जय ३६ गढ़ महतारी
- मैं वसुधा अंव
- नकाब वाले मनखे
- मै मै के चारों डाहर घूमत साहित्यकार – सुधा वर्मा
- हिरदे जुडा ले आजा मोर गांव रे : डॉ. विनय कुमार पाठक के गीत
- धरती के बेटा
- हतास जिनगानी : नान्हे कहिनी
- लोक कथा म ‘दसमत कइना’ के किस्सा
- दुकाल अऊ दुकाल
- धूंका-ढुलबांदर: रवीन्द्र कंचन
- नान्हे कहिनी – सवाल
- वाह रे मनखे के मन
- कमरछठ कहानी (6) – सोनबरसा बेटा
- राज्य स्तरीय छंदमय कवि गोष्ठी संपन्न
- आरूग चोला पहिरावय 10 जन
- “गंवई-गंगा” के गीत गवइया
